Friday, 1 June 2018

शर्मो हया

देखूँ तुझको लगा के टकटकी मैं बार बार
घायल करता है तेरा शर्म से करना आँखें चार

मुक़म्मल करे जो शबो क़ुदरत का आगाज़
आवाज़ तेरी है जैसे किसी पायल की झनकार

चाहूँ करना तुझसे मैं मोहब्बत बेशुमार
बरसों से रहा हूँ मैं बस तेरा तलबगार

यूँ तो होंगे बहुत तेरी तमन्ना करने वाले
ज़र्रा ज़र्रा है मेरा तेरी नज़रे करम का कर्ज़दार

गालों की नरमी करती गुलों को शर्मसार
तेरी भौंहे हैं तेरे हया की पहरेदार

छाँव पाने को तेरी गेसुओं की ओ सनम
नीलाम कर दें दीवाने खुदको सरे बाज़ार

No comments:

Post a Comment