Friday, 1 June 2018

जन्नत की हूरें

जमीं पर देख कर तुझको
खफा हैं जन्नत की हूरें भी
फ़रिश्ते भी बोल पड़े सादिक
हमें इंसान बनना है

तेरी ज़ुल्फ़ों से जो टकराएं
मुसलसल फिजाएं चंचल सी
क़ासिद-ए-खुदा ने भेजा वो
मुक़म्मल पैग़ाम बनना है

साक़ी को गुमाँ है ये
हयात है वो शान-ए-मैकदे की
तेरा मेहताब-ए-रुख चूमे जो
वो छलकता जाम बनना है

सज़ा-ए-इश्क़ देने की
बादस्तूर है ये रिवायत जो तेरी
लगे जो सादिए आशना को तेरे
वो हसीं इलज़ाम बनना है

ख़फ़ा है मेरा खुदा मुझसे
भूल बैठा हूँ उसे मोहब्बत में तेरी
उससे बग़ावत अगर बेईमानी है
कस्म-ए-ईमाँ मुझे बेईमाँ बनना है

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