जमीं पर देख कर तुझको
खफा हैं जन्नत की हूरें भी
फ़रिश्ते भी बोल पड़े सादिक
हमें इंसान बनना है
तेरी ज़ुल्फ़ों से जो टकराएं
मुसलसल फिजाएं चंचल सी
क़ासिद-ए-खुदा ने भेजा वो
मुक़म्मल पैग़ाम बनना है
साक़ी को गुमाँ है ये
हयात है वो शान-ए-मैकदे की
तेरा मेहताब-ए-रुख चूमे जो
वो छलकता जाम बनना है
सज़ा-ए-इश्क़ देने की
बादस्तूर है ये रिवायत जो तेरी
लगे जो सादिए आशना को तेरे
वो हसीं इलज़ाम बनना है
ख़फ़ा है मेरा खुदा मुझसे
भूल बैठा हूँ उसे मोहब्बत में तेरी
उससे बग़ावत अगर बेईमानी है
कस्म-ए-ईमाँ मुझे बेईमाँ बनना है
Friday, 1 June 2018
जन्नत की हूरें
Labels:
Ghazal
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment