Thursday, 23 July 2020

खिलौना

फ़िराक़-ए-यार सदीक, कुछ यूँ बसर की
अफ़सुर्दगी में गुज़ारे दिन, रो रो के सहर की

मुझे तस्लीम तेरा, दीवाना कहना मुझको
अब तो सारा वजूद ही, तेरे शौक़-ए-नज़र की

हुआ ज़माना नहीं वाकिफ़, कि दोस्तों उसने
तर्क़-ए-ताल्लुक़ की, किस किसको ख़बर की

ग़ज़ल में तज़करा उसका, करके मैंने
हर शेर में हर बार, अपनी ज़ात मुख़्तसर की

तुझसा खिलौना तोड़ कर, रोया हो कुछ पल
ऐ 'निसार' बता तेरे होने पे, किसने ये महर की !

ज़रयाब

अबतक ज़ीस्त का, ना-तवाँ हिसाब है ।
कैसे कहूँ बिन तेरे, कितना अज़ाब है !

दिल की ज़मीं ये जो, सोज़नुमा है
वजह क्या आफ़ताब है, या तेरा शबाब है

ज़ाया हुआ तेरे, नफ़्स-परस्त बनावट में
तेरी आँखें तेरे गेसू, सहरा-ओ-सराब हैं

वक़्त-ओ-सूरज का है, आज़माया हुआ
तेरा मुझसे मेरा तुझसे, रिश्ता ज़रयाब है

सच कहे कैसे, बिना झूठा बने 'निसार'
तेरे जलवों से भरी, मेरी क़िताब है

तस्वीर

इस महफ़िल में, तेरी तस्वीर का कोई सज़ावार नहीं
तेरी बयाँ-ए-कलियत के क़ाबिल, मेरे अशआर नहीं

भले घर न कर सकें दिल में, कलाम पीर के
तेरे घर के बाहर, उस ग़रीब की मज़ार सही

तेरी हथेली में ख़ुदको, मैं सौंप आया हूँ
मेरे मालिक, अब मेरा ख़ुदपे अख़्तियार नहीं

तुझसे बढ़े मरासिम, तो बढ़े ताल्लुक ज़माने से
ये दिल इसीलिए, अब पहले सा सोगवार नहीं 

अब और कितनों से बैर ले, तेरी ख़ातिर 'निसार'
अपनी इबादत में बस बर्बाद हुआ है, बेकार नहीं

कुलसुम

छू लूँ जो तुझे तो कुलसुम रहना 
हाँ, अपने आप में तू मकतुम रहना 

मैं चलूँ साथ, तो ख़ुश रहना तू
मुझे पास न पा, गुमसुम रहना

मैं क़मर सा, शब भर देखूँ तुझे
मेरी आसमाँ कि, अंजुम रहना

माँग बन, हर दोशीज़ा का तू
हर दुल्हन का, कुमकुम रहना

एक बूँद इश्क़, कर 'निसार' दामन पे
रंग ज़ीस्त, रंगरेज़ मेरे हमदम रहना