तेरी आशिक़ी में जाना, और कितना इल्ज़ाम लें !
तू बढ़ाती है हाथ, या दामन किसी और का थाम लें
ये शोख़ी, ये हया, ये नवाज़िशों की बारिश
तेरी शख़्सियत में डूबकर, बता कौनसा फ़ाम लें !
सोहबत का लुत्फ़, और गेसुओं की छाँव ली
जबीं चूम कर क्यों न, तेरी बलाएँ तमाम लें
पूछते हैं यार मेरे, है ख़ुशी की वजह कौन ?
अब फ़लरिस्त-ए-क़ातिल में, किस किसका नाम लें !
महफ़िल में बँट रही थी, नेमत बरबादों को
'निसार' आशिक़ी का क्यों न, हम भी इनाम लें !