Friday, 1 June 2018

तजर्बा

था तजर्बा कम और आलम इश्क़ का
है ताज्जुब महज़ आज इस बात का

बीच चीखों के टूटे दिलों के सनम
सोते कैसे हो चैन ओ सुकूँ से वहां

बेख़याली तेरी था वो तेरा पासबाँ
ग़म-ओ-खुशी में साथी किसी अश्क़ सा

छुपाना था हुनर उसका अपने हर दर्द को
रखके लबों पर मुस्कुराहट किसी कर्ज़ सा।

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