शिकस्तगी के आलम में था तू ही मेरा आमिल
किया ज़िन्दगी में अपनी तूने मुझको शामिल
बेआबरू हुए कितनी दफा नज़रों में अपनी ही
इस आस में की कर सकूँ तेरा प्यार मैं हासिल
केहती हूँ ये होकर मैं मेरे अश्कों से आदिल
रहबर तू,तुहि मेरे इश्क़ की राह का राहिल
खुद को पाने के सफर में ये पाया है मैंने
तू था ही नहीं कभी मेरे प्यार के क़ाबिल
No comments:
Post a Comment