Monday, 31 August 2020

पेंसिल

गो पी पीकर, बज़्म-ए-रिंदाँ में मर जाए कोई
अब गर वहाँ भी न जाए, तो कहाँ जाए कोई !

राह-ए-उल्फ़त में पड़ी शय को, उठा लिया कर
ग़ालिबन, तेरे जूड़े में पेंसिल सा सँवर जाए कोई |

ज़ुल्मत-ए-शब के मानिंद, ये गेसूओं की पहल
इनके होते, क्यों तलब सहर की लगाए कोई !

शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं, माजरा क्या है ?
मुझे यूँ रोज़ मारने से, क्यों न बाज़ आए कोई !

मयख़ाने बंद हैं शहर के, मेरी शोहरत से 'निसार'
अब तुझे होठों से न लगाए, तो किधर जाए कोई !

सदफ़

सारे फ़सानें रेत में, हुए रफ़्ता रफ़्ता बेनिशाँ
हुआ करता है ये गुनाह, मुझसे आदतन बार-हा

इस दिलगीर मुसाफ़त में, आशनाई ही नहीं
फ़िर कैसी ईसकी मंज़िल, फ़िर कैसा कारवाँ

कलमा थीं उसकी बातें, उसकी आँखें थीं वज़ू 
चाँद था उसका चहरा,थीं उसकी यादें ईदगाह

सदफ़ थी उसकी शख़्सियत, रही नीयत गौहार
बेसबब खुलना बना, सबब-ए-मर्ग-ए-ना-गहा

सुना है बड़ा रब्त है, उसे दीवानों से 'निसार'
चलो मक़तल को चलें, उसकी अना पे आज हाँ

सुख़न

धूप से सुर्ख़ रुख़सार, उसे सूरज कभी सताए नहीं
ये सुख़न मेरी सोज़ा है, उसकी बर्फ़ सी सदाएँ नहीं

मेरी नेकी का सबब वो, मेरी हालत का हर्फ़ उसपे
मेरे लहू का हर क़तरा, उसकी यादों से बाज़ आए नहीं

उसके बियाबाँ के साए को, छोड़ तो आए लेकिन
ये ख़लिश-ओ-तंज़-ए-ज़माना, मुझे रास आए नहीं

माना की पास-ए-वफ़ा, उसकी अदा न थी लेकिन
किसीकी रोज़-ए-ग़ुरबत, कभी कोई यूँ आज़माए नहीं

जिनकी अहद-ए-वफ़ा का, तुझको गुमाँ था 'निसार'
अब मर तो गया, क्या हुआ वो आज आए नहीं ?