गो पी पीकर, बज़्म-ए-रिंदाँ में मर जाए कोई
अब गर वहाँ भी न जाए, तो कहाँ जाए कोई !
राह-ए-उल्फ़त में पड़ी शय को, उठा लिया कर
ग़ालिबन, तेरे जूड़े में पेंसिल सा सँवर जाए कोई |
ज़ुल्मत-ए-शब के मानिंद, ये गेसूओं की पहल
इनके होते, क्यों तलब सहर की लगाए कोई !
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं, माजरा क्या है ?
मुझे यूँ रोज़ मारने से, क्यों न बाज़ आए कोई !
मयख़ाने बंद हैं शहर के, मेरी शोहरत से 'निसार'
अब तुझे होठों से न लगाए, तो किधर जाए कोई !