बयाँ करते हैं अश्क़ मेरे तुझसे मिलने की ख़्वाहिशें
याद तेरी जो आती है मैं शह ख्वाबों की लेता हूँ
दिन गुज़रता है रह रहकर रात किश्तों में कटती है
अकेलापन मेरे रहबर मैं तुझसे बाँट लेता हूँ
रश्क़ क्यों है ज़माने को तेरे मेरे इस रिश्ते से
पाकीज़ा से इस बंधन को मैं वफ़ा का नाम देता हूँ
पूछा जब ज़माने ने ज़ख्मों का सबब मेरे
पत्थर दिल पर रखकर मैं तेरा ही नाम लेता हूँ
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