ज़माने के तोहमतों के ही क़ाबिल हूँ मैं
एक उजाड़, बंजर, अकेली साहिल हूँ मैं
मुस्कुराने की अदा और सिक्कों की खनक से
अश्क़-ए-माज़ी छुपाने में माहिर हूँ मैं
आरज़ू नहीं दिल में न अरमाँ कोई
दस्तूर-ए-आम समझने में जाहिल हूँ मैं
हूँ खड़ी शौक़ से बाज़ार-ए-हुस्न में
नज़रों में बिकने को तुम्हारे हाज़िर हूँ मैं
ये अंधेर गलियाँ ही है अब आशियाना मेरा
न दुनिया न दिलों में ही शामिल हूँ मैं
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