Thursday, 20 April 2023

बेक़दरा

मेरा ज़ख्म मेरे लिए, यूँ बेक़दरा हो गया
कि यार की नज़र भर से, फ़िर हरा हो गया

उससे नफ़रतों की कोशिश में, ये राबता
हर तसव्वुर के साथ, और भी गहरा हो गया

मेरी आवाज़ से, ऐतराज़ था जिसे
ख़ामोश चीखों से, मेरी बहरा हो गया

हालातों के समंदर में, लावे सा वो
यूँ जला, की सूरज सा ज़हरा हो गया

मेरी तक़दीर पे, यूँ 'निसार' था खुदा
कि जहाँ पाँव रखा, वहीं सहरा हो गया

इलाज

दिल में तुझको रखकर, ये हिमाकत करें कैसे !
जज़्बात से महरूम, हम मोहब्बत लिखें कैसे !

गुलों से होंठ, ऐ गुलिस्तां से चहरे वाले
हम सिर्फ़ नजरों से, तेरी सजावट करें कैसे !

स्याह काजल, या सुर्ख़ शिकस्ता गेसू लिखें ?
गेहुएं रंग पर हाय, ये इतनी मुसीबात लिखें कैसे !

आज फिर दोबारा देखकर, आजाद कर दे हमें
अदालत-ए-इश्क में, हम तेरी वकालत करें कैसे !

तुझे एक टक निहारें, या तेरी पहलू में आ बैठें
खस्ता-हाल ' निसार', हम ये तिजारत करें कैसे !

तिष्टार

दिल में तुझको रखकर, ये हिमाकत करें कैसे !
जज़्बात से महरूम, हम मोहब्बत लिखें कैसे !

गुलों से होंठ, ऐ गुलिस्तां से चहरे वाले
हम सिर्फ़ नजरों से, तेरी सजावट करें कैसे !

स्याह काजल, या सुर्ख़ शिकस्ता गेसू लिखें ?
गेहुएं रंग पर हाय, ये इतनी मुसीबात लिखें कैसे !

आज फिर दोबारा देखकर, आजाद कर दे हमें
अदालत-ए-इश्क में, हम तेरी वकालत करें कैसे !

तुझे एक टक निहारें, या तेरी पहलू में आ बैठें
खस्ता-हाल ' निसार', हम ये तिजारत करें कैसे !

राज़

एक ग़ज़ल जिसे लिखा नहीं, एक राज़ जो खुला नहीं
मैं गैर था चलो ठीक है, मेरे हस्ती से बैर भला नहीं
वो आखरी मुलाकात अपनी, बे-अंजाम सी थी
कि उस रोज़ मैं मरा न था, और फ़िर जिया नहीं