ख़ता की है किसीसे इश्क़ करने की
एक हसीं की चाहत में रोज़ मरने की
मैं ही क्यों तरसूँ वफ़ा में ज़मानत को
सज़ा हो उसे भी मेरे दिल में उतरने की
Friday, 11 January 2019
ख़ता
ज़िक्र
आ रहूँ मैं लबों पर तेरे ज़िक्र की तरह
आऊँ जाऊँ बेझिझक मैं तुझमे फ़िक्र की तरह
तेरा गुलशन अधूरा है मेरी ख़ुशबू के बग़ैर
जज़्ब हो जाऊँ बदन में तेरे इत्र की तरह
ज़रूरत
ख़ूबसूरत मेरी कमज़ोरी वो मेरी ज़रूरत है
प्यारी सी शाज़ मेरी मेरे हुनर की मूरत है
उससे मिलना और मिलकर बिछड़ना भी
ग़मगीन ही सही पर मेरी ज़ाती मुहूरत है
जलपरी
मछलियाँ सारी झील की झुलस जाएँगी
अपना पूरा बदन अगर आप डुबाएँगी
चुरालूँ लबों से आपके जिस्म का नामक
वहाँ उधर से बशर्ते अगर इधर आएँगी
लाजवाब
इतना लाजवाब हुस्न लेकर हमसे सवाल न कर
ख़ुदा के ख़ातिर, इस भीड़ में ये बवाल न कर
तेरा दीवाना पहले वार से अभी उभरा कहाँ हैं
अपने दूसरे जलवों का अभी इस्तेमाल न कर
इंतज़ार
मत पूछ मैं अब तेरा इंतज़ार क्यों नहीं करता
ये झूठ है की मैं अब तुझसे प्यार नहीं करता
बचा नहीं मैं मुझमे कहीं भी तुझे ढूंढता हुआ
मैं ज़िंदा नहीं हूँ, मैं अब तुझपर मर नहीं सकता