Sunday, 21 November 2021

साया

क्या जानते हो, कि कितना कुछ नहीं जानते तुम !
मैंने कहा, मैं वो नहीं हूँ, पर नहीं मानते तुम !

दम घुटने लगा तुम्हारा, मेरे साए भर में ही
और तुम्हारा दावा है, कि हो मुझे पहचानते तुम !

हाल

तेरे दिल, ज़हन, दिमाग़ में कहीं नहीं हैं हम
जहाँ तू छोड़कर जाती है, वहीं कहीं हैं हम

सोचना ज़रूर चाहते हैं, हम ख़ास हैं तेरे
पर जानते हैं, इस बार सही नहीं हैं हम

आँख नम नहीं तेरे, मेरा हाल देखकर भी
इतना बता, क्या तेरे कुछ भी नहीं हैं हम

जिन यादों को याद कर, तेरे होंठ मुस्कुराएँ
यार क्या बताएँ, बस वहीं कहीं हैं हम

एक दिल भी बसता है, इस जिस्म के भीतर
'निसार' सिर्फ़, तेरे शग़्ल की ज़मीं नहीं हैं हम

दरिया

कोई दरिया, जैसे समंदर में खो गया
तुझसे जो भी मिला, तेरा ही हो गया

होठों पर छाले, और आँखें झुलस चुकीं
सहरा में, तेरी साया-ए-शजर में सो गया

अज़ल से तपिश में, साहिल पे खड़ा हूँ
एक मौज आया मेहरबाँ, और पाँव धो गया

मेरे अश्कों के मोती, हथेली में समेटकर
अपने नाम के, हर्फ़ की, तस्बीह पिरो गया

ज़हन चाँद और आँखें, सूरज हैं जिसकी
मैं 'निसार' ऐ दोस्त, तेरा मुहाजिर हो गया

सोहबत

न पूछ मेरी बेरुख़ी की वजह, 
मेरे यार मैं कुछ कहूंगा नहीं

न देख सवाली निगाह से मुझे, 
मेरे दोस्त मैं सह सकूंगा नहीं

तेरे पहलू में ही बैठा रहा वो शख़्स, 
जिसे कभी अपना कहा था तुमने

जिस सोहबत में मिलती तवज्जोह नहीं, 
ऐसी रफ़ाक़त में 'निसार' मैं रहूंगा नहीं

अख़्तियार

तन्हाई में मुझपर, बहोत अख़्तियार करता है
पर सर-ए-महफ़िल, मेरे वजूद से इनकार करता है

अगर इतना बुरा हूँ, तो नाते तोड़ ले मुझसे
क्यों अहद-ए-वफ़ा, की मुझपे फुवार करता है

वो बात नहीं करता, ज़ालिम रस्में निभाता है
दोस्त बनकर, दोस्ती का कारोबार करता है

जो सबका हो शैदाई, वो किसीका नहीं होता
गले लगकर, लिए नश्तर, तार-तार करता है

क्योंकर बने 'निसार', पशेमानी का सबब तेरे
कह दे हौसला नहीं, क्यों बहाने हज़ार करता है !

मल्लाह

उस मुसाफ़िर को, इस बियाबां में एक राह मिली
तू मिला, तो उस सहरा को, समंदर में पनाह मिली

ख़ून-ए-जिगर निकाल कर, लिखता था पन्नों पर
हमदर्दी की दरकार थी, पर बस वाह वाह मिली

मेरे ज़िंदाँ-ए-ज़ात में, तू आई इस तरह, की
बाद स्याह रात के, बाद-ए-सबा-ओ-ज़ुहा मिली

संग-दिलों कि संग-ज़नी, और खूँटे से बँधा वो
मुक़द्दर के मुजरिम को, तेरे दर पर फ़लाह मिली

बेकसी नाम का, एक राहगीर था 'निसार', जिसे
उस ओर जाना था, और तुझसी मल्लाह मिली

जानिब

मुझमें वो सारा का सारा,पर उसमें मेरा कुछ भी नहीं
उसकी जानिब सारा जहाँ और कोई मेरा कुछ भी नहीं

जो कहता था मोहब्बत में, ख़सारा ही नहीं होता
उसकी ओर देखा, मैं हँसा, पर कहा कुछ भी नहीं

एक अरसा जिसके पहलू में, बैठे रहे वो लोग
उसके ज़िंदगी के पहलू को, समझा कुछ भी नहीं

इतने आसेब पाल रखें हैं, ज़हन में अपने 
कि ज़ुल्म-ए-अज़ीज़ से, गिला शिकवा कुछ भी नहीं

पुर्सिश-ए-ग़म को भी 'निसार', उनसे आना न हुआ
वो जो कहते थे, "तेरे बिना ये जहाँ कुछ भी नहीं" 

मिल्कियत

जिनकी मिलकियत हो मुश्तबा, वो अश्क़ पोंछना क्या!
वो अदाकारा है, उसके आँसू क्या, उसका रोना क्या!
उसके दिल कि चौखट से दूर, कहीं रौंदे मिलेंगे हम
गुल-ए-परस्तिश के नसीब में, क्या गली और कोना क्या!

सजदा

लंबा है सफऱ तू मुझे साथ ले चल
साथ पुर-ख़तर है मेरा, साथ न चल

लबों से करूँ सजदा, अश्कों से पाँव धोऊँ
बिखर पाऊँ गर साजन , बिछाऊँ राह में आँचल

बेरहम गुनाहों के छाले लिए दिलपर
सफ़र तन्हा है मेरा, मेरी मंज़िल है मक़तल

बाहें सूनी हैं, हैं सूनी कराहें मेरी
ठहर न सही, पर मिलता रह मुसलसल

मुंसलिक करके, मुँह फ़ेर लोगे मुझसे
तन्हा रह जाएँगे, निसार और निसार की ग़ज़ल

आशना

तुझसे मिलने भर से, हुए कितने रुस्वा हम
अब भी इंसाँ हैं, या शायद बन गए ख़ुदा हम

बहोत लोग हैं, बहोत सी बातें हुआ करती हैं
अब तू बता, सिलें किस किसकी ज़बाँ हम !

रास ही न आया, बज़्म-ए-रिंदाँ में कोई हमें
तेरे पास न आते, तो करते क्या वहाँ हम !

दर्द की राह से गुज़रे, तो ज़माना जाने
वो राह-ए-सुख़न, कि हुए कैसे आशना हम

वो पूछते हैं कौन है, जिसपे तू 'निसार' है !
नहीं जानते, किस ओर देखें तेरे सिवा हम 

पत्थर

पुर-सुकूँ दिल लाए थे, मुज़्तर सा हो गया
मंज़र से कशमकश में, मंज़र का हो गया
इस शीशे ने टूटना, यहाँ गवारा न किया
सो पत्थर के शहर में, पत्थर सा हो गया

बिख़र

अपने माज़ी के मुजरिम हैं, हम मफ़र नहीं सकते
ऐ ग़म-गुसार दोस्त मेरे, तुम कुछ कर नहीं सकते

ठसाठस भरी हुई हैं, उम्मीदों की लाशों से
तुम चाह कर भी, इस गली से गुज़र नहीं सकते

अपनी दुखती नब्ज़ का, पता बताएंगे नहीं
अपना हाल जानते हैं, हम और बिख़र नहीं सकते

चारासाज़ी, चारासाज़ों की बेअसर ही रही
बद से बद्तर ही होंगे, हालात सुधर नहीं सकते

मोहब्बत नंगी हो और जफाएँ साज़ बजाती हों
ऐसी महफ़िल में, हम और ठहर नहीं सकते

सोचा कि अपनी कमी का, कराएँ अहसास लेकिन
यहाँ कुछ काम बाकी है, अभी हम मर नहीं सकते

मेरे हमसफ़र, सफ़र अपना बस यहीं तक था
'निसार' के साथ अंधेर घार में तुम उतर नहीं सकते

ज़हमत

अपनी ज़हमत को, कुछ यूँ किया ज़ाया हमनें
कि तेरे रुख़सार को, पानी पे बनाया हमनें

वो हर बार जब भी, भरी ख़ून की बोतल
तमाम वक़्त तुझे, पहलू में बिठाया हमनें

इश्क़ में यूँ भी, हिसाब हमनें बराबर रक्खा
जितना चाहा, तुझे उतना ही सताया हमनें

आज फ़िर हाथ लगी, मरहूम माँ की तस्वीर
आज फ़िर आँखों से, एक दरिया बहाया हमनें 

'निसार' फ़िर ख़ुला, वुसअत-ए-ग़म हमपर
दिल के वीराने को फ़िर, पत्थरों से सजाया हमनें

पराई

तू ज़िंदगी तो है, मगर पराई है
हमनें पत्थरों से, आस लगाई है

क्या क्या नहीं कहा, जहाँ ने हमको
तू भी कह दे, तो क्या बुराई है

ख़त को पढ़े बग़ैर, फ़ाड़ा न कर
न जाने किस लफ्ज़ में, कैसी दुहाई है

वो जो एक बार तेरा हुआ
उसे फ़िर कहाँ, ग़म से रिहाई है

अच्छे अच्छों ने किया, शिक़सता-दिल हमको
'निसार' कैसे बताएँ, किस्से कैसी निभाई है !

Wednesday, 14 April 2021

इनाम

तेरी आशिक़ी में जाना, और कितना इल्ज़ाम लें !
तू बढ़ाती है हाथ, या दामन किसी और का थाम लें

ये शोख़ी, ये हया, ये नवाज़िशों की बारिश
तेरी शख़्सियत में डूबकर, बता कौनसा फ़ाम लें !

सोहबत का लुत्फ़, और गेसुओं की छाँव ली
जबीं चूम कर क्यों न, तेरी बलाएँ तमाम लें

पूछते हैं यार मेरे, है ख़ुशी की वजह कौन ?
अब फ़लरिस्त-ए-क़ातिल में, किस किसका नाम लें !

महफ़िल में बँट रही थी, नेमत बरबादों को
'निसार' आशिक़ी का क्यों न, हम भी इनाम लें !

Bipolar Disorder

कभी माहौल शादमा, तो कभी लाश सा मंज़र
कभी ख़ुमारी इश्क़ सी, तो कभी सीने में ख़जर
जब वहम-ओ-हक़ीक़त की कश्मकश हो मामूल
लौ अक़्ल-ओ-दानाई की, बुझने लगती है अक्सर

Friday, 26 March 2021

जुगनू

उन्हें अलविदा कह, हम कुछ बुदबुदाते रह गए
लब सिल गए थे,उनके होंठ थरथराते रह गए

मुनासिब तो न था, यूँ राबते तोड़ना उनसे
ग़ैरत-ए-जज़्बात मगर हमें, आज़माते रह गए

अब बे-हिस-ओ-बेज़ार से, हम चल पड़े
ये तमाशबीन सारे हमको, बुलाते रह गए

उनसे, पहलू में बैठे सूरज की, शनाख़्त न हुई
सारी उम्र जुगनुओं से, मिलते मिलाते रह गए

उनके वादों के टूटने का, हिसाब क्या करना
उनका आना ऐसा था, कि आते ही रह गए

एक रोज़, उसे उजालों की दरकार आ पड़ी
अपना घर फूँक कर, हम मुस्कुराते रह गए

'निसार' ये कैसे लोग हैं, शजर उजाड़ देते हैं
और एक हम हैं, जो नशेमन बनाते रह गए

जफ़ा

जाने वो कैसे बढ़ चले, कहकर कि राबता तोड़ लिया
हम वहीं रहगुज़र पर रह गए, जिसने जहाँ छोड़ दिया

एक ग़ुलाब था जफ़ाओं का, हक़ीक़त के बगीचे में
सो पास गए, ख़ुदको पाया और तना पकड़ मरोड़ दिया

याद-ए-क़फ़स के फ़िशार में, हैं चीख़ें किसकी मुसलसल !
क्यों रंगीन हैं तीलियाँ, यूँ किसने सर को फोड़ लिया !

ग़म-ए-जहाँ को बसा लिया, जहाँ सिर्फ़ ग़म-ए-इश्क़ था, 
जो न छाँव मिली ज़ुल्फ़ों की, सो सारे आसमाँ को ओढ़ लिया

'निसार', सैराब था जो दामन, शबनम में उसकी वादों के
थामा जाम मयख़ाने में, और रफ़्ता रफ़्ता निचोड़ दिया

रिवायत

महर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़ था, पर अदावतें न थीं
हमारे दरम्यान, शिक़वे होकर भी शिक़ायतें न थीं

याद करके रोना, और रो रो कर याद करना
जहाँ तक याद आता है, मेरी ऐसी रिवायतें न थीं

झूठ, फ़रेब, रम्ज़ और दुनिया भर के चोंचले
इस पाकीज़ा रिश्ते में, ज़माने की मिलावटें न थीं

अश्क़ देकर उसे, मेरे होठों पर मुस्कान रहे
मेरी क़िस्मत में, कभी ऐसी रियायतें न थीं

'निसार' याद आता है, तेरा इश्क़ लिख़ना मुझे
पर उनमें भी कहीं ऐसी, ग़मगीन इनायतें न थीं

बेख़ुदी

सिवा बेख़ुदी के, उसका कोई और इस्तियारा न था
उस प्यारी क़फ़स से निजात, हमें गवारा न था

होठों पे ग़ज़ल और तसव्वुर, उसकी आँखों मे
अपने ही क़ातिल को, कभी हमनें यूँ सँवारा न था

हथेली में हरीफ़ों की, फ़ेहरिस्त रही दिनभर
तन्हा रातों में, फ़िर कोई आशना हमारा न था

हमारी बाद-ए-सबा के बग़ैर, उसमें बहार देख़कर 
ज़हन में अब कोई और, हसरत-ए-नज़ारा न था

तर्क़-ए-ताल्लुकात उससे, आसाँ न था 'निसार'
पर भूल जाने के सिवा, अब कोई चारा न था

इख़लास

इख़लास-ओ-अहद-ए-वफ़ा, सब वहम है
वो तेरा सनम, कहाँ सिर्फ़ तेरा ही सनम है !

दिन अश्क़, और रात आँखों मे बीत जाती है
उस हरजाई का कहना है कि, बस यही रहम है

मासूम चहरे और आईने की दास्ताँ यूँ रही
वो वहाँ सँवर गए, और ये टूटकर ख़तम है

वो जो कल ज़ीस्त बोझिल हुई, ग़म-ए-हिज्र में
सुना है कुछ लिख गया और आज अदम है

वाकिफ़ हूँ, पल भर ख़ुशी की सज़ा से 'निसार'
न मुस्कुरा ऐ ज़िंदगी, तुझे ज़िंदगी की क़सम है

नज़र-ए-करम

जहाँ तेरा, नज़र-ए-करम देखते हैं
मोहब्बत के, गुल-ओ-चमन देखते हैं

तू कहती है, है ग़ाफ़िल ज़माना तुझसे
जाने कितनी दफ़ा, तुझको हम देखते हैं

तुझे दिखता है, पानी में सिर्फ़ अक्स तेरा
उस आईने में हम, अक्स-ए-सनम देखते हैं

सिवा झुमके के नहीं, जलवा दूसरा यहाँ
वो क्या है कि, हम ज़रा कम देखते हैं 

'निसार' रूबरू तो हो,तू बे-पर्दा हमारे
हममें कितनी है बाक़ी, शरम देखते हैं !

बेक़सी

मिलने के सही वक़्त का, करती रही इंतेज़ार वो
आग़ोश में मेरी तस्वीर लिए, आज रोइ ज़ार ज़ार वो

आँखों में लिखी थीं, उसकी बेकसी की हक़ीक़तें
आज फ़िर काम नहीं आए, उसके बहाने हज़ार वो

जिसकी यादों ने सारा दिन, मुझे रोने नहीं दिया
इन तन्हा अंधेर रातों में, बनता है ग़म-गुसार वो

ताज्जुब नहीं, मज़लूम अगर एतिमाद न करे
तमाम उम्र भोली सूरतों का, करता रहा ऐतबार वो

अपने हिस्से के सवाबों का, साया जितना भी था
ज़िंदगी की धूप में, सारे किये उसपर 'निसार' वो