जैसे शाम कुमुदनि को चूम कर निकले कोई शबनम, जैसे धुप की आहो में हो कोई गा रहा सरगम, उस अर्क की किस्मत से ऐसा हसद हु मै व्यूना, के तेरे संजीदा चेहरे को देखकर भूला मैं सारे ग़म
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