Thursday, 23 April 2020

तिश्नगी

शहर-ए-तिश्नगी में तुझसा मैकदा न हो
तेरी शख़्सियत सा दूसरा मोजज़ा न हो
मुबारक हो सालगिराह और दुआएँ मेरी
ओ रफ़ीक़,तेरा दामन कभी ग़मज़दा न हो

अश्क़-ए-नवाज़

मेरा यार भी कितना, अश्क़-ए-नवाज़ है
ये ख़ुश्क तिनके टूटने की, आवाज़ है

चिलमानों के साए में, वो सँवरना उसका !
क्या इल्म था की ये, ग़ज़ल-ए-आगाज़ है

ये किसकी एड़ी में, मोछ आई देखो लोगों
ज़ीना-ए-उम्मीद से, उतरता ये कौन नासाज़ है !

उस पत्थर दिल से, गुहार न लगाऊँ इस दफ़ा
मेरे दर्द-ए-दिल से बड़ा, उसका एजाज़ है

नाम लेकर सहर हो, हर शब भीगें तकिए
इस बदनसीब को तो देखो, कितना मजाज़ है

उसके पाँव के नीचे, आ गया एक ग़ुलाब
वो हँसकर कहती है उसका यही अंदाज़ है

शिकस्ता

उसे दूर जाने की तो, वैसे इजाज़त नहीं थी
करें क्या ! मेरी उल्फ़त, अब मेरी उल्फ़त नहीं थी

किस्सा-ए-फ़िराक़ सुन, दिल में झाँक कर देखा
मेरे भगवान की, मेरे दिल में कोई मूरत नहीं थी

मुझे रोकना था जाना, मेरा दिल लगने से पहले
इस दिल्लगी की मेरी जाँ, कोई ज़रूरत नहीं थी

सिर्फ़ मैं ही नहीं था क़ैद, मौसीक़ी में उसकी
उसकी चाहत में, बहुतों को ज़मानत नहीं थी

हूँ शिकस्ता इसलिए, दीदार गवारा नहीं अब
वरना भरे जहाँ में, उसके जैसी सूरत नहीं थी

मर्ज़ी

ये दूरियाँ कहीं, उसकी मर्ज़ी तो नहीं ?!
उसकी मजबूरियाँ, कहीं ख़ुदगर्ज़ी तो नहीं ?!
जो अश्क़ पोछने चले हो, सादा-लौह सदीक
वो आँसू, वो आँसू कहीं फ़र्ज़ी तो नहीं ?!