Monday, 5 February 2024

हाल

हाल क्या है बाद मिलने के, तुझसे क्या बताएँ

तेरे ज़ुल्मों की फ़हरिस्त, कैसे तुझे दिखाएँ


चाँद सितारे और आसमाँ, थे कर रहे चर्चा तेरा

हमारी आपसी बात, भला हम तुझे क्यों बताएँ


रेशमी गेसू, मू-कमर, प्यासे होंठ, और उसपर

तेरी नफ़्स-परस्त बदन में हैं, जाने कैसी कैसी बलाएँ


मह-वश चहरा, नागिन-बाहें, सुराही-गर्दन और

परी-पैकर पर लहराती, तेरी साए सी घटाएँ


काकुले चहरे पे बिखरा के, देखती हो ऐसे

जी चाहता है पास बुलाकर, सारी रात जगाएँ


शमा जला जला के, तू बुझाती है मेरी जाँ

जब भी झपकती हैं, तेरी तेग़ सी तीख़ी निगाहें 


तुझे यूँ छुएँ की तू, मुझपे 'निसार' हो जाए

कुछ ऐसा करें कि, हर बार तुझे तुझसे ही चुराएँ

क़ुरबत


मेरे महबूब ने क़ुरबत का, ये सिला दिया मुझको

मुझसे इतनी की मोहब्बत, कि रुला दिया मुझको


मैंने मांगा था, मौत से बेहतर कोई आराम

तुमने अपनी गोद में, सुला लिया मुझको


बदन का सारा लहू, खिँचकर रुख़ पर आ गया

जब मैंने बहोत प्यार से, बोसा दिया तुझको


साँसों में हरारत, उनकी आँखों में शर्म थी

नाखून गड़ाए मुझमें, पर इनकार न किया मुझको


उनकी गोद में सर रखकर, उनकी आँखों के हो गए

इस साझा सपने ने, सातवे अर्श पर ला दिया मुझको


मेरे हाथों में तेरा चहरा, तेरी आँखें मेरी आँखों में

मेरे गोद की बिना में, आँखों से पिला दिया मुझको


अपने हाथों से, एक दूसरे को यूँ खिलाया हमनें

कि उसकी ममता ने, अपना बना लिया मुझको


होठों पे तबस्सुम, उनके दिल में हामी थी

हाथ सीने पे रखकर, अपना हाल सुना दिया मुझको


मैंने पाँव दबाए उनके, उन्होंने पाँव छू लिए

और सबके सामने, अपनी शानों पे सजा लिया मुझको


ज़माने की भीड़, और था वक़्त का तक़ाज़ा भी

हक़ जताकर तुमने, होठों से सजा दिया मुझको


मुझे चूर चूर कर दिया, अपनी बाहों में भरकर

बाहों में समेटकर, फ़िर विदा किया मुझको

सफ़ीना

मैं कैसे बताऊँ आपको, की क्या हो आप मेरी

मैं कितना बताऊँ आपको, की क्या हो आप मेरी


फ़ितना-ख़ेज़ जीवन, दिल है सफ़ीना सा मेरा

मैं नाव खेता सैलानी, दरिया हो आप मेरी


सूरज का शाम से जो, है रिश्ता बर्फ़ और सूरज का

टूट कर बरसे वो, सावन की घटा हो आप मेरी


मेरा संसार सहरा का, मेरा जीवन बीहड़ था

मैं मुसाफ़िर और, मेरे घर की पनाह हो आप मेरी


अब और कितने, तश्बीहों से बुलाऊँ 'निसार'

मेरे सीने से लगी, ज़ाती ख़ुदा हो आप मेरी

बताओ न

बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !


वक़्त के फ़ासले हैं, हमारे दरम्यान

इन दूरियों को तुम, मिटाती क्यों नहीं !


बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !


खिलाओगी तो खाएँगे, तुरई और करेला भी

अपने हाथों से मुझे, खिलाती क्यों नहीं !


बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !


पगलु हैं, शोनू हैं, कुकुल्लु हैं तुम्हारे

ऐसे और नामों से मुझे, बुलाती क्यों नहीं !


बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !


हमारे कल में, सितारों की चादर बिछी है

तुम पलकों को राहों में, बिछाती क्यों नहीं !


बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !


बग़ैर शराब के मुझे, यहाँ मख़मूर होना है

अपनी आँखों से, तुम मुझे पिलाती क्यों नहीं !


बताओ न,

बताओ न,

बताती क्यों नहीं !


जब प्यार है,

तुम्हें हमसे,

जताती क्यों नहीं !

जुर्रत

शायद सदियों से मैंने, यही जुर्रत की है

कि हर जन्म में, तुमसे ही मोहब्बत की है


मेरी ज़िंदगी में, तुम्हारी रोशनी से पहले

ऐसा लगता था, ज़िंदगी ज़ुल्मत सी है


मैं आधा आया, जिया और आधा ही रहा

मेरे अधूरेपन का मदावा, तुम्हारी सोहबत ही है


तुमसे मिला, और मिलकर हार मान ली मैंने

मुझसे जीतना भी, तुम्हारी शफ़ाक़त ही है


मांग के सिंदूर से, पैरों की बिछिया तक

तुम्हारी सूरत, तुम्हारी सीरत मेरी मिल्कियत ही है


तुम्हारा ख़याल, मेरे तबस्सुम की वजह है

तुम्हारे इश्क़ ने देखो, मेरी कैसी हालत की है


मेरे मन की गगरी में, प्रेम का सागर है सजनी

कहूँ कैसे की, तुमसे कितनी उल्फ़त की है


मेरी पिहू, मेरी सजनी, ओ मेरी मेहरारू

हर तरह, तुम्हें अपना कहने की हिम्मत की है


हर जनम में, मेरी जानम तुम ही रहो

तू मेरी ज़िंदगी में खुशियों की हलावत सी है


वो ग़ज़ल सी सीरत, वो ग़ज़ाल सी आँखें

और भीगी ज़ुल्फ़ों नें, मुझपे इनायत की है


हर रोज़ हो प्यार , हर रोज़ मैं तुमपे 'निसार'

ऐसी दुआएँ, मैंने उस अनहद से की है

किनाया

न कह सको अगर, तो किनाया करो

पर ज़हन में, मुसलसल बसाया करो


साथ तुम्हारे, एक उम्र बितानी है मुझे

इस धूप में, अपनी ज़ुल्फ़ों का साया करो


तोड़ दो मुझे, अपनी बाहों में समेटकर

फ़िर उन्हीं हाथों से, मुझे बनाया करो


भौंह साग़र, और आँखें शराब हैं तुम्हारी

उसी झील में, मुझे तुम डुबाया करो


तुम कहती हो, तुम्हे है मोहब्बत मुझसे

हर ज़बान में, हर पहर ये जताया करो


तुम्हारे लफ्ज़ और साँसों में मोहब्बत भरी है

मुझे, मोहब्बत भरे लहज़े में बुलाया करो


मेरी सखी,मेरी संगिनी, मेरी सहचरी हो तुम 

हर रूप में, मुझे ख़ुदसे मिलाया करो


मेरे साथ बंधकर भी, तुम आज़ाद ही रहो

अपनी ख़्वाहिशें, मुझे तुम बताया करो


तुम्हें पलकों पे, अपनी बिठाएँगे हम

खुदको अपनी ही धुन पे, नचाया करो


सर पर हाथ रख, अपने सीने से लगा लो

कुछ मेरी सुनो, कुछ अपनी सुनाया करो


मुश्किलें आसाँ सी हो जाएँगी, संग तुम्हारे

हाथ थाम कर मेरा, पानी पर चलाया करो


तुम्हें सारे ऐबों के साथ, चाहता है 'निसार'

अपनी नादानियों से मुझे, सताया करो

इश्क़ और अश्क़

एक ओर इश्क़, दूजे ओर अश्क़ तौलोगी क्या ?

मैं लिखूँ ग़ज़लें, तुम कुछ नहीं बोलोगी क्या ?


सारा दिन चकोर, चाँद के इंतेज़ार में बैठी

बीती रात मेरी ख़ातिर, किवाड़ खोलोगी क्या ?


आँखों मे नींद और मेरे बदन में थकावट होगी

मुझे हर शाम अपनी गोद में, सोने दोगी क्या?


मैं वाकिफ़ हूँ तुम्हारे, श्रृंगार के लगाव से, लेकिन

बरसात में मेरे साथ, खुदको भिगा लोगी क्या?  


राह-ए-हस्ती के इस, जलते सफ़र में

मेरी मालकिन, मेरी अर्धांगिनी बनोगी क्या ?


मैं वो बशर हूँ 'निसार' , फ़रिश्ते करें जिसे सजदा

पल्लू में बाँधकर, मुझे अपना बना लोगी क्या ?

ज़मानी

मैं इस ज़माने में, ज़मानी न बन सका

इश्क़ मेरा, दिल्लगी सा, फ़ानी न बन सका

तू सुनाए मजमे में, अपनी सहेलियों को

मैं चाह कर भी, ऐसी कहानी न बन सका

ज़हन

वो कारवाँ मेरे दिल का कभी लुटा ही नहीं

मेरी बर्बादी के इर्द गिर्द हुजूम जुटा ही नहीं


यहाँ पानी की तरह बहाए हैं रिश्ते मैंने

मेरी गागर में वो एक सागर रुका ही नहीं


बिछ जाता कदमों में आसमाँ की तरह लेकिन

मैं भला उसे मनाता कैसे जो रूठा ही नहीं


नक़ली अज़ाब, फ़र्ज़ी दिलासे, झूठी उम्मीदें

ये दिल मक्कार भी है, सिर्फ झूठा ही नहीं


ऐ 'निसार' न कुरेद गुज़रे ज़माने की राख

ये वो शरर है जो अबतक बुझा ही नहीं

कारवाँ

वो कारवाँ मेरे दिल का कभी लुटा ही नहीं

मेरी बर्बादी के इर्द गिर्द हुजूम जुटा ही नहीं


यहाँ पानी की तरह बहाए हैं रिश्ते मैंने

मेरी गागर में वो एक सागर रुका ही नहीं


बिछ जाता कदमों में आसमाँ की तरह लेकिन

मैं भला उसे मनाता कैसे जो रूठा ही नहीं


नक़ली अज़ाब, फ़र्ज़ी दिलासे, झूठी उम्मीदें

ये दिल मक्कार भी है, सिर्फ झूठा ही नहीं


ऐ 'निसार' न कुरेद गुज़रे ज़माने की राख

ये वो शरर है जो अबतक बुझा ही नहीं