Thursday, 19 November 2020

रुख़सार

दीवार-ए-दौर पर लिखी, ये जो लंबी लंबी कहानी है
कुछ जुनूँ, कुछ मर्ज़, कुछ कच्ची उम्रों की नादानी है

दुल्हन सी सजा दो, मोहब्बत की चिताओं को
सोज़-ए-शब-ए-हिज्राँ का, कहाँ दूसरा कोई सानी है !

आँखों से छलक कर, जो न रुख़सार पर तड़पे
अगर मुझसे पूछो जाना, तो वो अश्क़ नहीं वो पानी है

तेरी बाँहों की बिना रख़कर, तुझे जी भर निहारा है
बाद तसव्वुर-ए-नंदन, अब भला नींद कहाँ आनी है

'निसार' बैठा है, महफ़िल-ए-हुस्न में जुदा सबसे 
शराफ़त का नहीं शैदाई, बस किसी की बात मानी है

सज़ावार

मैं अदना क़तरा लोगों, दरिया का सज़ावार हुआ
सर्द सी मौजों की बाहें, इस जैसा मेरा दयार हुआ

इसी की जुस्तजू रही, बरसों मेरी आँखें को
बाद बरसों के हमनशीं, तेरे जौबन का दीदार हुआ

साग़र छलक जाए है, तेरी होठों की शराफ़त से
तेरी मयकशी में साक़ी, यहाँ लैल-ओ-नहार हुआ

दिल शादमा रहा, तेरे नशेमन की पनाह में
इस दुनिया मे रहकर, मैं दुनिया से बेज़ार हुआ

जो तेरे हाथ उठते हैं, मेरी ख़ातिर दुआओं में
मैं संगदिल तेरे प्यार में, धीरे धीरे 'निसार' हुआ

ख़ुश-फ़हम

है हुनर-ए-ख़ुश-फ़हम में, कितना वो माहिर
क्या मेरे आलम-ए-ग़ुरबत से, नहीं ये ज़ाहिर !

अपने आसमाँ का, सितारा कहा था उसने
सो अब हर दफ़ा टूटते हैं, हर मुराद की ख़ातिर

परवाज़ नहीं, हुई बिछड़न, दो परिंदो को नसीब
मोहब्बत के नशेमन का, ये अंजाम हुआ आख़िर

हूँ झूठा, मुनाफ़िक़ और, तोहमतों से भरी है ज़ीस्त
लेकिन हम भी तो देखें, यहाँ कौन कितना है ताहिर

'निसार' तैराक बहोत हैं, इश्क़-ए-गौहार के सदके
हौसला डूबने का हो, यहाँ ये ज़ज़्बात हैं नादिर