दीवार-ए-दौर पर लिखी, ये जो लंबी लंबी कहानी है
कुछ जुनूँ, कुछ मर्ज़, कुछ कच्ची उम्रों की नादानी है
दुल्हन सी सजा दो, मोहब्बत की चिताओं को
सोज़-ए-शब-ए-हिज्राँ का, कहाँ दूसरा कोई सानी है !
आँखों से छलक कर, जो न रुख़सार पर तड़पे
अगर मुझसे पूछो जाना, तो वो अश्क़ नहीं वो पानी है
तेरी बाँहों की बिना रख़कर, तुझे जी भर निहारा है
बाद तसव्वुर-ए-नंदन, अब भला नींद कहाँ आनी है
'निसार' बैठा है, महफ़िल-ए-हुस्न में जुदा सबसे
शराफ़त का नहीं शैदाई, बस किसी की बात मानी है