Sunday, 23 February 2020

लकीरें

ओ माजून-ए-शबाब, कर बातों पर अमल मेरी
थाम हथेली रोज़-ए-हश्र में, लकीरें बदल मेरी
आ फ़ानी-ए-आलम में, इश्क़ जावेदां करलें
उतर काग़ज़-ओ-रौशनाई में, बन ग़ज़ल मेरी

चूड़ियाँ

एक ओर इश्क़, दूजे ओर अश्क़ तौलोगी क्या ?
मैं लिखूँ ग़ज़लें, तुम कुछ नहीं बोलोगी क्या ?

सारा दिन चकोर, चाँद के इंतेज़ार में रोइ
बीती रात मेरी ख़ातिर, किवाड़ खोलोगी क्या ?

मुझे इक़रार-ए-ग़म की, इजाज़त नहीं नसीब
मेरे हिस्से के आँसू भी, तुम रो लोगी क्या ? 

ख़्वाब नींद की इजाज़त, नहीं देते मालकिन
बावजूद मेरी मौजूदगी के, सो लोगी क्या ?

मैं वाकिफ़ हूँ तुम्हारे, श्रृंगार के लगाव से लेकिन
मेरे शिकस्ता जनाज़े पर, चूड़ियाँ तोड़ोगी क्या ?

मज़लूम

हम इश्क़ से मज़लूम हैं, हैं इश्क़ से महरूम
ख़ता किसकी, कौन मुजरिम, हमें नहीं मालूम

संग-ओ-शीशा वही, वही तुम हो वही हम हैं
लाश सा वीराना वही, वही कौवों का हुजूम

बिछड़कर तुमसे भी, हम कहाँ अर्श पर पहुँचे !
न मिला ख़ुदा, न तुम मिले, न रूह को सुकून

हासिल नहीं अब भी, तुम्हारी यादों से निजात
फर्श-ए-क़फ़स पर, पड़े हैं टूटे हुए नाख़ून

मोहब्बत की मुसाफ़त में, मंज़िलें नहीं मिलतीं
हैं ज़ख़्मी कितने यहाँ, यहाँ कितने हुए मरहूम

सोज़

मैं तो मरकर भी पुर्ज़ा-ए-कहकशाँ न हुआ
हुआ बे-हिस-ओ-बे-ज़ार, पर पशेमाँ न हुआ
उनसे कहदो कि मसर्रत नसीब थी मुझको
जिनकी सोज़-ए-उन्स में, मैं पारसा न हुआ

तूफ़ां

तूफां समेटकर, सीने में जलते हुए देख
टकरा सही, फ़िर संग पिघलते हुए देख
जज़ीरे को नामंज़ूर है, लहरों का दख़ल
दे दस्तक, फ़िर साहिल बदलते हुए देख

चौखट

तेरे नाम के शबनम, चमन में छोड़ आए हैं
भिगोकर अश्कों से दामन, निचोड़ आए हैं
ऐ शीशागर, न तलाश कर शहर के कूचो में
तेरी चौखट पर दिल अपना, हम तोड़ आए हैं

डर

यही मसला मेरे सामने शब-ओ-सहर है
तुझसे मिलना बेख़ुदी, तेरी जुदाई ज़हर है
यही अशआर मेरे चहरे पर लिखे हैं जाना
"तुझे खोने से ज़्यादा तुझे भूलने का डर है"

आग़ोश

तेरी आग़ोश-ए-बाँह में कर ऐ सितमगर इतना
तहरीर-ए-अश्क़ लिए मेरी आँखों में दिखना
अदा करना कर्ज़-ए-मेहर-ओ-वफ़ा इस तरह
अपने काजल से इश्क़ मेरे चहरे पर लिखना

कर सकोगे ?

मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, क्या मुझसे मुकर सकोगे ?
साथ मेरे, अंधेर घार में, क्या कभी उतर सकोगे ?
वजह पूछते हो, सदीक मुझसे, उदासी का मेरे
सबब जान कर भी, उदासी का, क्या कर सकोगे !

मुराद

तेरी मुराद से, मेरी जाँ, इन्हें मसर्रत नहीं होगी
ये कागज़ के सूरमा हैं, इनसे मोहब्बत नहीं होगी
अपनी मांग भरने की, तू इनसे मांग न करना
इन लफ़ज़ी आशिक़ों से, कभी ये जुर्रत नहीं होगी

हस्ती

नमी चुराकर, समंदर से, तुम बादल करना
अपने दीवाने को, थोड़ा और, पागल करना
अब और किस्से, सजाऊँ, तेरी सूरत को मैं !
जाओ, हस्ती जलाकर मेरी, तुम काजल करना

मर्ज़

जो तुझसे मिला मुझे, वो मर्ज़ क्या है ?
मोहब्बत में मुझपर, ये कर्ज़ क्या है ?

गालों तक नहीं पहुँचे, तेरे अश्क़ आँखों से
मेरे होंठ वाकिफ़ हैं, कि उनका फ़र्ज़ क्या है !

आँखों के दर पर जब, नींद दस्तक दे
मेरी शानों पर सर रख ले, हर्ज़ क्या है !

है नूरानी चहरा क्यों, ज़ुल्फ़ की आड़ में
मेरे सूरज को, ढकने का, ये तर्ज़ क्या है !

ओढ़े हुए थी तू, चांदनी की चादर को
लिखें ग़ज़ल या क़सीदे, अर्ज़ क्या है ?

मयस्सर

अपने हुस्न को इतना कम न आँका कीजिए
ज़रा देर तलक अपनी आँखों में झाँका कीजिए
एक ज़माने से मयस्सर नहीं शहर को शराब
आप आते जाते कभी रुख यहाँ का कीजिए

नेमत

तेरी सीरत, अमावस की चाँदनी
हो माफ़ तारों की जुर्रत, मेरी नाज़नीं
क़ुरबातों में तेरी, शमा जलती रहे
सारी नेमत-ए-जहाँ, तुझमे हों लाज़मी

पहलू

फ़क़त मैं ही हूँ, मेरी तक़दीर पर, रोने वाला
सब हासिल कर, सिर्फ़ उसको खोने वाला

बारिश-ए-पुर्सा, कर रहा है, आज बहोत
मुझे मेरे ही, आँसुओं में, डुबोने वाला

वो भी, अपनी तस्वीर, वहाँ देख न सका
मेरे सीने में, नश्तर-ए-जफ़ा, चुभोने वाला

उसकी भी उड़ी नींद, मेरी ग़ज़ल सुनकर 
कई बरसों से, मेरी चीख़ पर, सोने वाला

मेरे पहलू में, गुज़ारी हैं, कई शामें उसने
वो जो आज है, किसी और का होने वाला

इल्तेजा

टूटे सितारों से इल्तेजा कलंदर नहीं करते
हम क़तरा-ए-परेशानी को समंदर नहीं करते
हम नख़रे उठाते हैं अपने पाबंद-ए-सुकूनत की
दिल में बसने वालों को हम दर-ब-दर नहीं करते

ज़ात

उनका कहना कि, अब से, शायद ही बात हो,
अरे, मेरी नज़रों से देखो, तुम मेरी ज़ात हो
रोएंगे नहीं, मोहब्बत को, रुसवा न करेंगे लेकिन
इन अश्कों से, कहूं कैसे कि, तुम मेरा साथ दो

अना

ये जो तुम रोज़, नए ख़ून-ए-इश्क़ में, नहा लेते हो,
इस तरह, कितनी दौलत-ए-अना, कमा लेते हो !
दिल में नासूर लिए, मुस्कुराने के, आदी हैं हम तो
तुम इतने दिल तोड़कर, भला कैसे, मुस्कुरा लेते हो !

राख

ये क्या की, राख़-ए-माज़ी को, छेड़ रही हो
क्या बेचैन हो ?, उंगलियां मरोड़ रही हो !
"कैसे बन गए हो ?", ये सवाल न पूछो हमसे
क्यों अपनी बनाई चीज़ से, मुंह मोड़ रही हो !

ज़िक्र उसका

अपने दीवाने को इतना, सताया न करो
सिर्फ़ मिलना है, तो मिलने आया न करो

चुराए हैं कुछ लम्हें, वक़्त की किताब से
रस्मों रिवाजों में उन्हें, यूं ज़ाया न करो

सर-ओ-नाज़ किए हैं, सदके तुम्हारे
हमें, तुम्हारी चौखट से, उठाया न करो

तुम्हारी गोद में सनम, मौत सा आराम है
मौत से, हमें हमारी, जगाया न करो

हाँ उसी की देन है, ये शेर-ओ-सुखन लेकिन,
यार हर बात में, ज़िक्र उसका, लाया न करो

झलक

ज़ह-ए-नसीब, उसकी गली तुम, अगर जाओ
उस कमर-ए-समंदर, की झलक, अगर पाओ
अब कुछ और, सज़ा-वार-ए-दीद, नहीं साहब
ख़ुदाया इश्क़ करो उससे, और बस, मर जाओ

रूदाद

इश्क़ में मेरी, तुम गगरी से छलक रहे हो 
हम रूदाद में उलझे रहे, तुम पन्ने पलट रहे हो
मेरा तजरबा-ए-सोहबत, हो ज़ाहिर ज़माने में
तुम हश्र मोहब्बत का, बताते ग़लत रहे हो

न मिला

कर सके, बयाँ मेरा ग़म, वो कलाम न मिला
मेरी आग़ाज़-ए-मोहब्बत को, अंजाम न मिला

तेरे, आशिक़-ओ-शायरों की भीड़ में,
मुझे मुझसा, ऐ सितमगर, कोई बदनाम न मिला

बेचकर के हक़ीक़त, हैं ख़रीदे ख़्वाब तेरे
पर मेरी रूह को, मुनासिब दाम न मिला

तेरी इश्क़ भरी, आँखों का समंदर, क्या कीजे !
इस ख़ाली पैमाने को, वो जाम न मिला

भले तुम भूल जाओ, पर तारीख़ याद रक्खेगी
कि इस जनाज़े को, महबूब का सलाम न मिला