Thursday, 19 November 2020

रुख़सार

दीवार-ए-दौर पर लिखी, ये जो लंबी लंबी कहानी है
कुछ जुनूँ, कुछ मर्ज़, कुछ कच्ची उम्रों की नादानी है

दुल्हन सी सजा दो, मोहब्बत की चिताओं को
सोज़-ए-शब-ए-हिज्राँ का, कहाँ दूसरा कोई सानी है !

आँखों से छलक कर, जो न रुख़सार पर तड़पे
अगर मुझसे पूछो जाना, तो वो अश्क़ नहीं वो पानी है

तेरी बाँहों की बिना रख़कर, तुझे जी भर निहारा है
बाद तसव्वुर-ए-नंदन, अब भला नींद कहाँ आनी है

'निसार' बैठा है, महफ़िल-ए-हुस्न में जुदा सबसे 
शराफ़त का नहीं शैदाई, बस किसी की बात मानी है

सज़ावार

मैं अदना क़तरा लोगों, दरिया का सज़ावार हुआ
सर्द सी मौजों की बाहें, इस जैसा मेरा दयार हुआ

इसी की जुस्तजू रही, बरसों मेरी आँखें को
बाद बरसों के हमनशीं, तेरे जौबन का दीदार हुआ

साग़र छलक जाए है, तेरी होठों की शराफ़त से
तेरी मयकशी में साक़ी, यहाँ लैल-ओ-नहार हुआ

दिल शादमा रहा, तेरे नशेमन की पनाह में
इस दुनिया मे रहकर, मैं दुनिया से बेज़ार हुआ

जो तेरे हाथ उठते हैं, मेरी ख़ातिर दुआओं में
मैं संगदिल तेरे प्यार में, धीरे धीरे 'निसार' हुआ

ख़ुश-फ़हम

है हुनर-ए-ख़ुश-फ़हम में, कितना वो माहिर
क्या मेरे आलम-ए-ग़ुरबत से, नहीं ये ज़ाहिर !

अपने आसमाँ का, सितारा कहा था उसने
सो अब हर दफ़ा टूटते हैं, हर मुराद की ख़ातिर

परवाज़ नहीं, हुई बिछड़न, दो परिंदो को नसीब
मोहब्बत के नशेमन का, ये अंजाम हुआ आख़िर

हूँ झूठा, मुनाफ़िक़ और, तोहमतों से भरी है ज़ीस्त
लेकिन हम भी तो देखें, यहाँ कौन कितना है ताहिर

'निसार' तैराक बहोत हैं, इश्क़-ए-गौहार के सदके
हौसला डूबने का हो, यहाँ ये ज़ज़्बात हैं नादिर

Wednesday, 14 October 2020

वाबस्ता

मुझे दोस्तों से गिला, दुश्मनों से काम रहा
न गुनाह हुआ, न क़ैद हुई, बस यूँ ही बदनाम रहा

उसकी उल्फ़त के दावों का, ये हश्र हुआ साहब
न करार-ए-वफ़ा, न हिना में ही मेरा नाम रहा

जा बिछेगी उनके गुलशन में, ख़ाक उड़कर मेरी
जिनकी नज़रों में, ये वजूद बदनुमा इल्ज़ाम रहा

होकर रुस्वा उनके हाथों, हैराँ हुआ लेकिन
शहर-ए-क़ातिल में ऐ दोस्त,ये सिलसिला आम रहा

नहीं रोता कोई ख़ातिर किसीके, उम्र भर 'निसार'
न वाबस्ता सिया रही, अब ना ही कोई राम रहा

मुअत्तर

कड़वी सही लेकिन, मुअत्तर शराब थी वो
हम आवारा, बदचलन, आशिक़ों का आदाब थी वो

उसकी ख़ामियों के शैदाई, सारे शहर भर में थे
क़सम ख़ामियों की, यार बड़ी ख़राब थी वो

आग़ाज़ से ग़ाफ़िल, था मैं अंजाम से वाकिफ़
मेरी आँखों मे बसी, एक ज़िंदा ख़्वाब थी वो

ख़ुश्क सहरा के, मोहताज मुकीमों के ख़ातिर
मौत के पहलू में बैठी, सुकून-ओ-सराब थी वो

साए में खड़ी रही, इतनी दरख़्तों के लेकिन
दोस्तों ग़ौरतलब है, कि फ़िर भी नीलाब थी वो

वक़्त लगा दोस्तों, असल तह ज़ाहिर होने में
गुलशन-ए-उल्फ़त का मेरी, ग़ुलाब थी वो

उजाड़ी बस्तियाँ, थी हाथों में ख़ून की मेहंदी
अपनी नज़रों में फ़िर भी, 'निसार' आबाद थी वो

दलदल

दलदल में खड़े शख़्स, की ओर हाथ न बढ़ा
वो अपना मुख़ालिफ़ है, उसे अपना न बना

गर धँसता है, तो धँस जाए, मर ही जाए वो
शिकस्ता-दिल से दिल की, क़रीबियाँ न बढ़ा

फ़िरता है शहर भर में, कालिख़ पोत कर
दीवानों को ख़ज़ानों का, पासबाँ न बना

बाशिंदा अंधेरों का, है माज़ी का मारा वो
तन्हा राहों के मुसाफ़िर से, राबता न बढ़ा

किस किस के वास्ते, क्या क्या 'निसार' है
लेकर हिसाब-ए-सितम, उसे अदना न बना

पैराहन

चीथड़े पहने हुए, वहाँ वो शख़्स, अब हमारा नहीं
बाज़ार-ए-हुस्न में, इससे बेहतर नज़ारा नहीं

ज़रा से दाग़ पे, जो लोग, पैराहन बदलते हैं
तजवीज़-ए-रफ़ू, हमें उनकी गवारा नहीं

हमारे कमीज़ में, सुराख़, बहोत हैं वाइज़
तेरा दामन भी कोई, अतलस-ए-इस्तियारा नहीं

अश्क़ सूख़ते हैं, कलम में स्याही की तरह
कौन कहता है, इस व्यापार में ख़सारा नहीं

हैं नक़ाब रेशम के, सड़ चुके चहरों पे 'निसार'
यार, यहाँ कोई, सादा-लौह-ओ-बेचारा नहीं

दानिस्ता

मैंने दानिस्ता, तेरे दिल को दुखाया नहीं
वो ग़ुज़रिशें थीं मेरी, तंज़-ओ-किनाया नहीं

वाकिफ़ रही तेरे, दिल के जानिब वसवसों से 
कहीं कुछ टूट न जाए, इसलिए बताया नहीं

माना कि नहीं मुझको, मोहब्बतों का पास
सो, जो पास न था मेरे, वो लौटाया नहीं

गवाह हूँ, गुनाहगार भी, तेरी अज़ाबों का मैं
न गुज़रा जो मुझसे, वो तुझतक आया नहीं

'निसार' बोझल रहा दिल, बाद तर्क़ के
दिल में रह गया तू, तुझे दिल से हटाया नहीं

Monday, 31 August 2020

पेंसिल

गो पी पीकर, बज़्म-ए-रिंदाँ में मर जाए कोई
अब गर वहाँ भी न जाए, तो कहाँ जाए कोई !

राह-ए-उल्फ़त में पड़ी शय को, उठा लिया कर
ग़ालिबन, तेरे जूड़े में पेंसिल सा सँवर जाए कोई |

ज़ुल्मत-ए-शब के मानिंद, ये गेसूओं की पहल
इनके होते, क्यों तलब सहर की लगाए कोई !

शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं, माजरा क्या है ?
मुझे यूँ रोज़ मारने से, क्यों न बाज़ आए कोई !

मयख़ाने बंद हैं शहर के, मेरी शोहरत से 'निसार'
अब तुझे होठों से न लगाए, तो किधर जाए कोई !

सदफ़

सारे फ़सानें रेत में, हुए रफ़्ता रफ़्ता बेनिशाँ
हुआ करता है ये गुनाह, मुझसे आदतन बार-हा

इस दिलगीर मुसाफ़त में, आशनाई ही नहीं
फ़िर कैसी ईसकी मंज़िल, फ़िर कैसा कारवाँ

कलमा थीं उसकी बातें, उसकी आँखें थीं वज़ू 
चाँद था उसका चहरा,थीं उसकी यादें ईदगाह

सदफ़ थी उसकी शख़्सियत, रही नीयत गौहार
बेसबब खुलना बना, सबब-ए-मर्ग-ए-ना-गहा

सुना है बड़ा रब्त है, उसे दीवानों से 'निसार'
चलो मक़तल को चलें, उसकी अना पे आज हाँ

सुख़न

धूप से सुर्ख़ रुख़सार, उसे सूरज कभी सताए नहीं
ये सुख़न मेरी सोज़ा है, उसकी बर्फ़ सी सदाएँ नहीं

मेरी नेकी का सबब वो, मेरी हालत का हर्फ़ उसपे
मेरे लहू का हर क़तरा, उसकी यादों से बाज़ आए नहीं

उसके बियाबाँ के साए को, छोड़ तो आए लेकिन
ये ख़लिश-ओ-तंज़-ए-ज़माना, मुझे रास आए नहीं

माना की पास-ए-वफ़ा, उसकी अदा न थी लेकिन
किसीकी रोज़-ए-ग़ुरबत, कभी कोई यूँ आज़माए नहीं

जिनकी अहद-ए-वफ़ा का, तुझको गुमाँ था 'निसार'
अब मर तो गया, क्या हुआ वो आज आए नहीं ?

Thursday, 23 July 2020

खिलौना

फ़िराक़-ए-यार सदीक, कुछ यूँ बसर की
अफ़सुर्दगी में गुज़ारे दिन, रो रो के सहर की

मुझे तस्लीम तेरा, दीवाना कहना मुझको
अब तो सारा वजूद ही, तेरे शौक़-ए-नज़र की

हुआ ज़माना नहीं वाकिफ़, कि दोस्तों उसने
तर्क़-ए-ताल्लुक़ की, किस किसको ख़बर की

ग़ज़ल में तज़करा उसका, करके मैंने
हर शेर में हर बार, अपनी ज़ात मुख़्तसर की

तुझसा खिलौना तोड़ कर, रोया हो कुछ पल
ऐ 'निसार' बता तेरे होने पे, किसने ये महर की !

ज़रयाब

अबतक ज़ीस्त का, ना-तवाँ हिसाब है ।
कैसे कहूँ बिन तेरे, कितना अज़ाब है !

दिल की ज़मीं ये जो, सोज़नुमा है
वजह क्या आफ़ताब है, या तेरा शबाब है

ज़ाया हुआ तेरे, नफ़्स-परस्त बनावट में
तेरी आँखें तेरे गेसू, सहरा-ओ-सराब हैं

वक़्त-ओ-सूरज का है, आज़माया हुआ
तेरा मुझसे मेरा तुझसे, रिश्ता ज़रयाब है

सच कहे कैसे, बिना झूठा बने 'निसार'
तेरे जलवों से भरी, मेरी क़िताब है

तस्वीर

इस महफ़िल में, तेरी तस्वीर का कोई सज़ावार नहीं
तेरी बयाँ-ए-कलियत के क़ाबिल, मेरे अशआर नहीं

भले घर न कर सकें दिल में, कलाम पीर के
तेरे घर के बाहर, उस ग़रीब की मज़ार सही

तेरी हथेली में ख़ुदको, मैं सौंप आया हूँ
मेरे मालिक, अब मेरा ख़ुदपे अख़्तियार नहीं

तुझसे बढ़े मरासिम, तो बढ़े ताल्लुक ज़माने से
ये दिल इसीलिए, अब पहले सा सोगवार नहीं 

अब और कितनों से बैर ले, तेरी ख़ातिर 'निसार'
अपनी इबादत में बस बर्बाद हुआ है, बेकार नहीं

कुलसुम

छू लूँ जो तुझे तो कुलसुम रहना 
हाँ, अपने आप में तू मकतुम रहना 

मैं चलूँ साथ, तो ख़ुश रहना तू
मुझे पास न पा, गुमसुम रहना

मैं क़मर सा, शब भर देखूँ तुझे
मेरी आसमाँ कि, अंजुम रहना

माँग बन, हर दोशीज़ा का तू
हर दुल्हन का, कुमकुम रहना

एक बूँद इश्क़, कर 'निसार' दामन पे
रंग ज़ीस्त, रंगरेज़ मेरे हमदम रहना

Wednesday, 3 June 2020

An Abandoned Dog

A starved dog, in a stormy night
Treads slowly, with a hope in it's sight
Drenched in it's tears, it's legs are frail
Leaves in its path, a vanishing trail

It's breath is cold, it's steps are bold
" Lasting love ?", Or so it was told
"I ask you my master, why did you forsake ?"
"Why was I deserted ? What was my mistake ?!"


"You were too clingy, I grew tired of you"
Said the master, with a resolve undue
"I couldn't keep you, of course I tried"
"Yes I promised you the world, and yes I lied"

सफ़ीना

खड़ा होकर जज़ीरे पर, तड़पता देखता रहा
सफ़ीना, तूफाँ-ए-समंदर में जूझता, टूटता रहा

हर चाराह-गर ने, हर बार, दावा किया लेकिन
ये ज़ख्म मेरे दिल का, मगर रिसता रहा

तमाशबीन बने रहे, रफ़ीक़-ओ-फ़रिश्ते मेरे
मेरा इश्क़ बेआबरू हुआ, लुटता रहा

कलम टूट गयी, बिखरती रही स्याही
बह गए अश्क़ सारे, लहू लिखता रहा

सोगवार रही ज़ीस्त, जिसके इक़रार पे 'निसार'
उसका एहद-ए-वफा, कौड़ियो में बिकता रहा

Thursday, 23 April 2020

तिश्नगी

शहर-ए-तिश्नगी में तुझसा मैकदा न हो
तेरी शख़्सियत सा दूसरा मोजज़ा न हो
मुबारक हो सालगिराह और दुआएँ मेरी
ओ रफ़ीक़,तेरा दामन कभी ग़मज़दा न हो

अश्क़-ए-नवाज़

मेरा यार भी कितना, अश्क़-ए-नवाज़ है
ये ख़ुश्क तिनके टूटने की, आवाज़ है

चिलमानों के साए में, वो सँवरना उसका !
क्या इल्म था की ये, ग़ज़ल-ए-आगाज़ है

ये किसकी एड़ी में, मोछ आई देखो लोगों
ज़ीना-ए-उम्मीद से, उतरता ये कौन नासाज़ है !

उस पत्थर दिल से, गुहार न लगाऊँ इस दफ़ा
मेरे दर्द-ए-दिल से बड़ा, उसका एजाज़ है

नाम लेकर सहर हो, हर शब भीगें तकिए
इस बदनसीब को तो देखो, कितना मजाज़ है

उसके पाँव के नीचे, आ गया एक ग़ुलाब
वो हँसकर कहती है उसका यही अंदाज़ है

शिकस्ता

उसे दूर जाने की तो, वैसे इजाज़त नहीं थी
करें क्या ! मेरी उल्फ़त, अब मेरी उल्फ़त नहीं थी

किस्सा-ए-फ़िराक़ सुन, दिल में झाँक कर देखा
मेरे भगवान की, मेरे दिल में कोई मूरत नहीं थी

मुझे रोकना था जाना, मेरा दिल लगने से पहले
इस दिल्लगी की मेरी जाँ, कोई ज़रूरत नहीं थी

सिर्फ़ मैं ही नहीं था क़ैद, मौसीक़ी में उसकी
उसकी चाहत में, बहुतों को ज़मानत नहीं थी

हूँ शिकस्ता इसलिए, दीदार गवारा नहीं अब
वरना भरे जहाँ में, उसके जैसी सूरत नहीं थी

मर्ज़ी

ये दूरियाँ कहीं, उसकी मर्ज़ी तो नहीं ?!
उसकी मजबूरियाँ, कहीं ख़ुदगर्ज़ी तो नहीं ?!
जो अश्क़ पोछने चले हो, सादा-लौह सदीक
वो आँसू, वो आँसू कहीं फ़र्ज़ी तो नहीं ?!

Sunday, 23 February 2020

लकीरें

ओ माजून-ए-शबाब, कर बातों पर अमल मेरी
थाम हथेली रोज़-ए-हश्र में, लकीरें बदल मेरी
आ फ़ानी-ए-आलम में, इश्क़ जावेदां करलें
उतर काग़ज़-ओ-रौशनाई में, बन ग़ज़ल मेरी

चूड़ियाँ

एक ओर इश्क़, दूजे ओर अश्क़ तौलोगी क्या ?
मैं लिखूँ ग़ज़लें, तुम कुछ नहीं बोलोगी क्या ?

सारा दिन चकोर, चाँद के इंतेज़ार में रोइ
बीती रात मेरी ख़ातिर, किवाड़ खोलोगी क्या ?

मुझे इक़रार-ए-ग़म की, इजाज़त नहीं नसीब
मेरे हिस्से के आँसू भी, तुम रो लोगी क्या ? 

ख़्वाब नींद की इजाज़त, नहीं देते मालकिन
बावजूद मेरी मौजूदगी के, सो लोगी क्या ?

मैं वाकिफ़ हूँ तुम्हारे, श्रृंगार के लगाव से लेकिन
मेरे शिकस्ता जनाज़े पर, चूड़ियाँ तोड़ोगी क्या ?

मज़लूम

हम इश्क़ से मज़लूम हैं, हैं इश्क़ से महरूम
ख़ता किसकी, कौन मुजरिम, हमें नहीं मालूम

संग-ओ-शीशा वही, वही तुम हो वही हम हैं
लाश सा वीराना वही, वही कौवों का हुजूम

बिछड़कर तुमसे भी, हम कहाँ अर्श पर पहुँचे !
न मिला ख़ुदा, न तुम मिले, न रूह को सुकून

हासिल नहीं अब भी, तुम्हारी यादों से निजात
फर्श-ए-क़फ़स पर, पड़े हैं टूटे हुए नाख़ून

मोहब्बत की मुसाफ़त में, मंज़िलें नहीं मिलतीं
हैं ज़ख़्मी कितने यहाँ, यहाँ कितने हुए मरहूम

सोज़

मैं तो मरकर भी पुर्ज़ा-ए-कहकशाँ न हुआ
हुआ बे-हिस-ओ-बे-ज़ार, पर पशेमाँ न हुआ
उनसे कहदो कि मसर्रत नसीब थी मुझको
जिनकी सोज़-ए-उन्स में, मैं पारसा न हुआ

तूफ़ां

तूफां समेटकर, सीने में जलते हुए देख
टकरा सही, फ़िर संग पिघलते हुए देख
जज़ीरे को नामंज़ूर है, लहरों का दख़ल
दे दस्तक, फ़िर साहिल बदलते हुए देख

चौखट

तेरे नाम के शबनम, चमन में छोड़ आए हैं
भिगोकर अश्कों से दामन, निचोड़ आए हैं
ऐ शीशागर, न तलाश कर शहर के कूचो में
तेरी चौखट पर दिल अपना, हम तोड़ आए हैं

डर

यही मसला मेरे सामने शब-ओ-सहर है
तुझसे मिलना बेख़ुदी, तेरी जुदाई ज़हर है
यही अशआर मेरे चहरे पर लिखे हैं जाना
"तुझे खोने से ज़्यादा तुझे भूलने का डर है"

आग़ोश

तेरी आग़ोश-ए-बाँह में कर ऐ सितमगर इतना
तहरीर-ए-अश्क़ लिए मेरी आँखों में दिखना
अदा करना कर्ज़-ए-मेहर-ओ-वफ़ा इस तरह
अपने काजल से इश्क़ मेरे चहरे पर लिखना

कर सकोगे ?

मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, क्या मुझसे मुकर सकोगे ?
साथ मेरे, अंधेर घार में, क्या कभी उतर सकोगे ?
वजह पूछते हो, सदीक मुझसे, उदासी का मेरे
सबब जान कर भी, उदासी का, क्या कर सकोगे !

मुराद

तेरी मुराद से, मेरी जाँ, इन्हें मसर्रत नहीं होगी
ये कागज़ के सूरमा हैं, इनसे मोहब्बत नहीं होगी
अपनी मांग भरने की, तू इनसे मांग न करना
इन लफ़ज़ी आशिक़ों से, कभी ये जुर्रत नहीं होगी

हस्ती

नमी चुराकर, समंदर से, तुम बादल करना
अपने दीवाने को, थोड़ा और, पागल करना
अब और किस्से, सजाऊँ, तेरी सूरत को मैं !
जाओ, हस्ती जलाकर मेरी, तुम काजल करना

मर्ज़

जो तुझसे मिला मुझे, वो मर्ज़ क्या है ?
मोहब्बत में मुझपर, ये कर्ज़ क्या है ?

गालों तक नहीं पहुँचे, तेरे अश्क़ आँखों से
मेरे होंठ वाकिफ़ हैं, कि उनका फ़र्ज़ क्या है !

आँखों के दर पर जब, नींद दस्तक दे
मेरी शानों पर सर रख ले, हर्ज़ क्या है !

है नूरानी चहरा क्यों, ज़ुल्फ़ की आड़ में
मेरे सूरज को, ढकने का, ये तर्ज़ क्या है !

ओढ़े हुए थी तू, चांदनी की चादर को
लिखें ग़ज़ल या क़सीदे, अर्ज़ क्या है ?

मयस्सर

अपने हुस्न को इतना कम न आँका कीजिए
ज़रा देर तलक अपनी आँखों में झाँका कीजिए
एक ज़माने से मयस्सर नहीं शहर को शराब
आप आते जाते कभी रुख यहाँ का कीजिए

नेमत

तेरी सीरत, अमावस की चाँदनी
हो माफ़ तारों की जुर्रत, मेरी नाज़नीं
क़ुरबातों में तेरी, शमा जलती रहे
सारी नेमत-ए-जहाँ, तुझमे हों लाज़मी

पहलू

फ़क़त मैं ही हूँ, मेरी तक़दीर पर, रोने वाला
सब हासिल कर, सिर्फ़ उसको खोने वाला

बारिश-ए-पुर्सा, कर रहा है, आज बहोत
मुझे मेरे ही, आँसुओं में, डुबोने वाला

वो भी, अपनी तस्वीर, वहाँ देख न सका
मेरे सीने में, नश्तर-ए-जफ़ा, चुभोने वाला

उसकी भी उड़ी नींद, मेरी ग़ज़ल सुनकर 
कई बरसों से, मेरी चीख़ पर, सोने वाला

मेरे पहलू में, गुज़ारी हैं, कई शामें उसने
वो जो आज है, किसी और का होने वाला

इल्तेजा

टूटे सितारों से इल्तेजा कलंदर नहीं करते
हम क़तरा-ए-परेशानी को समंदर नहीं करते
हम नख़रे उठाते हैं अपने पाबंद-ए-सुकूनत की
दिल में बसने वालों को हम दर-ब-दर नहीं करते

ज़ात

उनका कहना कि, अब से, शायद ही बात हो,
अरे, मेरी नज़रों से देखो, तुम मेरी ज़ात हो
रोएंगे नहीं, मोहब्बत को, रुसवा न करेंगे लेकिन
इन अश्कों से, कहूं कैसे कि, तुम मेरा साथ दो

अना

ये जो तुम रोज़, नए ख़ून-ए-इश्क़ में, नहा लेते हो,
इस तरह, कितनी दौलत-ए-अना, कमा लेते हो !
दिल में नासूर लिए, मुस्कुराने के, आदी हैं हम तो
तुम इतने दिल तोड़कर, भला कैसे, मुस्कुरा लेते हो !

राख

ये क्या की, राख़-ए-माज़ी को, छेड़ रही हो
क्या बेचैन हो ?, उंगलियां मरोड़ रही हो !
"कैसे बन गए हो ?", ये सवाल न पूछो हमसे
क्यों अपनी बनाई चीज़ से, मुंह मोड़ रही हो !

ज़िक्र उसका

अपने दीवाने को इतना, सताया न करो
सिर्फ़ मिलना है, तो मिलने आया न करो

चुराए हैं कुछ लम्हें, वक़्त की किताब से
रस्मों रिवाजों में उन्हें, यूं ज़ाया न करो

सर-ओ-नाज़ किए हैं, सदके तुम्हारे
हमें, तुम्हारी चौखट से, उठाया न करो

तुम्हारी गोद में सनम, मौत सा आराम है
मौत से, हमें हमारी, जगाया न करो

हाँ उसी की देन है, ये शेर-ओ-सुखन लेकिन,
यार हर बात में, ज़िक्र उसका, लाया न करो

झलक

ज़ह-ए-नसीब, उसकी गली तुम, अगर जाओ
उस कमर-ए-समंदर, की झलक, अगर पाओ
अब कुछ और, सज़ा-वार-ए-दीद, नहीं साहब
ख़ुदाया इश्क़ करो उससे, और बस, मर जाओ

रूदाद

इश्क़ में मेरी, तुम गगरी से छलक रहे हो 
हम रूदाद में उलझे रहे, तुम पन्ने पलट रहे हो
मेरा तजरबा-ए-सोहबत, हो ज़ाहिर ज़माने में
तुम हश्र मोहब्बत का, बताते ग़लत रहे हो

न मिला

कर सके, बयाँ मेरा ग़म, वो कलाम न मिला
मेरी आग़ाज़-ए-मोहब्बत को, अंजाम न मिला

तेरे, आशिक़-ओ-शायरों की भीड़ में,
मुझे मुझसा, ऐ सितमगर, कोई बदनाम न मिला

बेचकर के हक़ीक़त, हैं ख़रीदे ख़्वाब तेरे
पर मेरी रूह को, मुनासिब दाम न मिला

तेरी इश्क़ भरी, आँखों का समंदर, क्या कीजे !
इस ख़ाली पैमाने को, वो जाम न मिला

भले तुम भूल जाओ, पर तारीख़ याद रक्खेगी
कि इस जनाज़े को, महबूब का सलाम न मिला