Wednesday, 14 October 2020

वाबस्ता

मुझे दोस्तों से गिला, दुश्मनों से काम रहा
न गुनाह हुआ, न क़ैद हुई, बस यूँ ही बदनाम रहा

उसकी उल्फ़त के दावों का, ये हश्र हुआ साहब
न करार-ए-वफ़ा, न हिना में ही मेरा नाम रहा

जा बिछेगी उनके गुलशन में, ख़ाक उड़कर मेरी
जिनकी नज़रों में, ये वजूद बदनुमा इल्ज़ाम रहा

होकर रुस्वा उनके हाथों, हैराँ हुआ लेकिन
शहर-ए-क़ातिल में ऐ दोस्त,ये सिलसिला आम रहा

नहीं रोता कोई ख़ातिर किसीके, उम्र भर 'निसार'
न वाबस्ता सिया रही, अब ना ही कोई राम रहा

मुअत्तर

कड़वी सही लेकिन, मुअत्तर शराब थी वो
हम आवारा, बदचलन, आशिक़ों का आदाब थी वो

उसकी ख़ामियों के शैदाई, सारे शहर भर में थे
क़सम ख़ामियों की, यार बड़ी ख़राब थी वो

आग़ाज़ से ग़ाफ़िल, था मैं अंजाम से वाकिफ़
मेरी आँखों मे बसी, एक ज़िंदा ख़्वाब थी वो

ख़ुश्क सहरा के, मोहताज मुकीमों के ख़ातिर
मौत के पहलू में बैठी, सुकून-ओ-सराब थी वो

साए में खड़ी रही, इतनी दरख़्तों के लेकिन
दोस्तों ग़ौरतलब है, कि फ़िर भी नीलाब थी वो

वक़्त लगा दोस्तों, असल तह ज़ाहिर होने में
गुलशन-ए-उल्फ़त का मेरी, ग़ुलाब थी वो

उजाड़ी बस्तियाँ, थी हाथों में ख़ून की मेहंदी
अपनी नज़रों में फ़िर भी, 'निसार' आबाद थी वो

दलदल

दलदल में खड़े शख़्स, की ओर हाथ न बढ़ा
वो अपना मुख़ालिफ़ है, उसे अपना न बना

गर धँसता है, तो धँस जाए, मर ही जाए वो
शिकस्ता-दिल से दिल की, क़रीबियाँ न बढ़ा

फ़िरता है शहर भर में, कालिख़ पोत कर
दीवानों को ख़ज़ानों का, पासबाँ न बना

बाशिंदा अंधेरों का, है माज़ी का मारा वो
तन्हा राहों के मुसाफ़िर से, राबता न बढ़ा

किस किस के वास्ते, क्या क्या 'निसार' है
लेकर हिसाब-ए-सितम, उसे अदना न बना

पैराहन

चीथड़े पहने हुए, वहाँ वो शख़्स, अब हमारा नहीं
बाज़ार-ए-हुस्न में, इससे बेहतर नज़ारा नहीं

ज़रा से दाग़ पे, जो लोग, पैराहन बदलते हैं
तजवीज़-ए-रफ़ू, हमें उनकी गवारा नहीं

हमारे कमीज़ में, सुराख़, बहोत हैं वाइज़
तेरा दामन भी कोई, अतलस-ए-इस्तियारा नहीं

अश्क़ सूख़ते हैं, कलम में स्याही की तरह
कौन कहता है, इस व्यापार में ख़सारा नहीं

हैं नक़ाब रेशम के, सड़ चुके चहरों पे 'निसार'
यार, यहाँ कोई, सादा-लौह-ओ-बेचारा नहीं

दानिस्ता

मैंने दानिस्ता, तेरे दिल को दुखाया नहीं
वो ग़ुज़रिशें थीं मेरी, तंज़-ओ-किनाया नहीं

वाकिफ़ रही तेरे, दिल के जानिब वसवसों से 
कहीं कुछ टूट न जाए, इसलिए बताया नहीं

माना कि नहीं मुझको, मोहब्बतों का पास
सो, जो पास न था मेरे, वो लौटाया नहीं

गवाह हूँ, गुनाहगार भी, तेरी अज़ाबों का मैं
न गुज़रा जो मुझसे, वो तुझतक आया नहीं

'निसार' बोझल रहा दिल, बाद तर्क़ के
दिल में रह गया तू, तुझे दिल से हटाया नहीं