मुझे दोस्तों से गिला, दुश्मनों से काम रहा
न गुनाह हुआ, न क़ैद हुई, बस यूँ ही बदनाम रहा
उसकी उल्फ़त के दावों का, ये हश्र हुआ साहब
न करार-ए-वफ़ा, न हिना में ही मेरा नाम रहा
जा बिछेगी उनके गुलशन में, ख़ाक उड़कर मेरी
जिनकी नज़रों में, ये वजूद बदनुमा इल्ज़ाम रहा
होकर रुस्वा उनके हाथों, हैराँ हुआ लेकिन
शहर-ए-क़ातिल में ऐ दोस्त,ये सिलसिला आम रहा
नहीं रोता कोई ख़ातिर किसीके, उम्र भर 'निसार'
न वाबस्ता सिया रही, अब ना ही कोई राम रहा