अपनी दुनिया को बेशक़ जलाकर ख़ुश हैं
ग़म को हम गले लगाकर ख़ुश हैं
उसकी बेवफ़ाई का कलमा ख़ुदा जानता है
हम अपनी वफ़ाएँ निभाकर ख़ुश हैं
नाक़ाम इश्क़ की क्या बात करें साहब
हम उसकी मोहब्बत में ख़ुदको आज़माकर ख़ुश हैं
सौगात आँसुओं की भले वो दे गया मुझे
हम फूल खुशियों के उसपे बरसाकर खुश हैं
जो आया नहीं दोस्तों दिल की पुकार पर
हम जनाज़े में उसको बुलाकर खुश हैं
हमसे दूरी में जो चैनों सुकूँ ढूंढते थे
उसे मौत पर हम अपनी रुलाकर खुश हैं
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