Friday, 26 March 2021

जुगनू

उन्हें अलविदा कह, हम कुछ बुदबुदाते रह गए
लब सिल गए थे,उनके होंठ थरथराते रह गए

मुनासिब तो न था, यूँ राबते तोड़ना उनसे
ग़ैरत-ए-जज़्बात मगर हमें, आज़माते रह गए

अब बे-हिस-ओ-बेज़ार से, हम चल पड़े
ये तमाशबीन सारे हमको, बुलाते रह गए

उनसे, पहलू में बैठे सूरज की, शनाख़्त न हुई
सारी उम्र जुगनुओं से, मिलते मिलाते रह गए

उनके वादों के टूटने का, हिसाब क्या करना
उनका आना ऐसा था, कि आते ही रह गए

एक रोज़, उसे उजालों की दरकार आ पड़ी
अपना घर फूँक कर, हम मुस्कुराते रह गए

'निसार' ये कैसे लोग हैं, शजर उजाड़ देते हैं
और एक हम हैं, जो नशेमन बनाते रह गए

जफ़ा

जाने वो कैसे बढ़ चले, कहकर कि राबता तोड़ लिया
हम वहीं रहगुज़र पर रह गए, जिसने जहाँ छोड़ दिया

एक ग़ुलाब था जफ़ाओं का, हक़ीक़त के बगीचे में
सो पास गए, ख़ुदको पाया और तना पकड़ मरोड़ दिया

याद-ए-क़फ़स के फ़िशार में, हैं चीख़ें किसकी मुसलसल !
क्यों रंगीन हैं तीलियाँ, यूँ किसने सर को फोड़ लिया !

ग़म-ए-जहाँ को बसा लिया, जहाँ सिर्फ़ ग़म-ए-इश्क़ था, 
जो न छाँव मिली ज़ुल्फ़ों की, सो सारे आसमाँ को ओढ़ लिया

'निसार', सैराब था जो दामन, शबनम में उसकी वादों के
थामा जाम मयख़ाने में, और रफ़्ता रफ़्ता निचोड़ दिया

रिवायत

महर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़ था, पर अदावतें न थीं
हमारे दरम्यान, शिक़वे होकर भी शिक़ायतें न थीं

याद करके रोना, और रो रो कर याद करना
जहाँ तक याद आता है, मेरी ऐसी रिवायतें न थीं

झूठ, फ़रेब, रम्ज़ और दुनिया भर के चोंचले
इस पाकीज़ा रिश्ते में, ज़माने की मिलावटें न थीं

अश्क़ देकर उसे, मेरे होठों पर मुस्कान रहे
मेरी क़िस्मत में, कभी ऐसी रियायतें न थीं

'निसार' याद आता है, तेरा इश्क़ लिख़ना मुझे
पर उनमें भी कहीं ऐसी, ग़मगीन इनायतें न थीं

बेख़ुदी

सिवा बेख़ुदी के, उसका कोई और इस्तियारा न था
उस प्यारी क़फ़स से निजात, हमें गवारा न था

होठों पे ग़ज़ल और तसव्वुर, उसकी आँखों मे
अपने ही क़ातिल को, कभी हमनें यूँ सँवारा न था

हथेली में हरीफ़ों की, फ़ेहरिस्त रही दिनभर
तन्हा रातों में, फ़िर कोई आशना हमारा न था

हमारी बाद-ए-सबा के बग़ैर, उसमें बहार देख़कर 
ज़हन में अब कोई और, हसरत-ए-नज़ारा न था

तर्क़-ए-ताल्लुकात उससे, आसाँ न था 'निसार'
पर भूल जाने के सिवा, अब कोई चारा न था

इख़लास

इख़लास-ओ-अहद-ए-वफ़ा, सब वहम है
वो तेरा सनम, कहाँ सिर्फ़ तेरा ही सनम है !

दिन अश्क़, और रात आँखों मे बीत जाती है
उस हरजाई का कहना है कि, बस यही रहम है

मासूम चहरे और आईने की दास्ताँ यूँ रही
वो वहाँ सँवर गए, और ये टूटकर ख़तम है

वो जो कल ज़ीस्त बोझिल हुई, ग़म-ए-हिज्र में
सुना है कुछ लिख गया और आज अदम है

वाकिफ़ हूँ, पल भर ख़ुशी की सज़ा से 'निसार'
न मुस्कुरा ऐ ज़िंदगी, तुझे ज़िंदगी की क़सम है

नज़र-ए-करम

जहाँ तेरा, नज़र-ए-करम देखते हैं
मोहब्बत के, गुल-ओ-चमन देखते हैं

तू कहती है, है ग़ाफ़िल ज़माना तुझसे
जाने कितनी दफ़ा, तुझको हम देखते हैं

तुझे दिखता है, पानी में सिर्फ़ अक्स तेरा
उस आईने में हम, अक्स-ए-सनम देखते हैं

सिवा झुमके के नहीं, जलवा दूसरा यहाँ
वो क्या है कि, हम ज़रा कम देखते हैं 

'निसार' रूबरू तो हो,तू बे-पर्दा हमारे
हममें कितनी है बाक़ी, शरम देखते हैं !

बेक़सी

मिलने के सही वक़्त का, करती रही इंतेज़ार वो
आग़ोश में मेरी तस्वीर लिए, आज रोइ ज़ार ज़ार वो

आँखों में लिखी थीं, उसकी बेकसी की हक़ीक़तें
आज फ़िर काम नहीं आए, उसके बहाने हज़ार वो

जिसकी यादों ने सारा दिन, मुझे रोने नहीं दिया
इन तन्हा अंधेर रातों में, बनता है ग़म-गुसार वो

ताज्जुब नहीं, मज़लूम अगर एतिमाद न करे
तमाम उम्र भोली सूरतों का, करता रहा ऐतबार वो

अपने हिस्से के सवाबों का, साया जितना भी था
ज़िंदगी की धूप में, सारे किये उसपर 'निसार' वो