Friday, 1 June 2018

पखेरू

खुशबू में वफ़ा की तेरी  महक जाता हूँ मैं
सुन आहेटें तेरी पखेरू सा चहक जाता हूं मैं

जाने पहचाने  से तेरे दिल के शहर में
अपनी बनाई राह से भटक जाता हूं मैं

ग़मगीन रुख देख तेरा सिसक जाता हूं मैं
बालियों की बोली में तेरे खनक पता हूँ मैं

हंसते बचपने के तेरे मासूम से नशे में
एक नौशिखिये शराबी सा बहक जाता हूं मैं

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