Monday, 29 October 2018

ये मुनासिब नहीं

आता नहीं है मुझे आँखों से बात करना
एक दूसरे में खोकर दिन को रात करना

तबस्सुम, हया और तेरा आँखें चुराकर तकना
मुनासिब नहीं सारे सितम एक साथ करना

घायल न हो जाऊँ तेरे नज़रों के वार से
अपने दीवाने पर बस इतनी एहतियात करना

है मोहब्बत अगर तो दे दिल में जगह मुझे
मेरे ख़ास शौकों में नहीं है बेबात मरना

इश्क़ है तो हो जज़्बा सनम में जज़्ब होने का
इस दिल्लगी में होगा ग़म-ए-ज़ात वरना

Wednesday, 24 October 2018

आँच

सोना है, ज़ुल्म की आँच में निखर ही जाएगा
आँखें भरी हैं, कहीं देर की तो बिखर ही जाएगा
न रोको उसे जाने से मैख़ाने के बाहर लोगों
किसीकी याद भुलाने को फिर इधर ही आएगा

Tuesday, 23 October 2018

नक़ाब

दिल की बात को दिल ही में रहना होगा
मेरा ग़म दुनिया को भी सहना होगा

मेरे जिस्म पर बनें घाव जो इश्क़ में तेरे
पाकीज़ा रूह का मेरी वही गहना होगा

अगर तू चाहे निकलना कभी दिल से मेरे
लहू को भी पानी सा बहना होगा

मोहब्बत का क़त्ल करके जाओगे कहाँ !
मेरा अफ़साना तुझे ज़माने से कहना होगा

न ढूंढ मेरे लफ़्ज़ों में मेरे ग़म की दास्ताँ
शायद शब्दों नें भी नक़ाब आज पहना होगा

क़ब्र

कबतक मेरे दर्द पे मुस्कुराएँगे वो !
जी भर गया या और भी रुलाएँगे वो !

उनसे कह दो की वक़्त है मना लें मुझे
या मेरे जनाज़े पर आकर मनाएँगे वो !

मुझे मिली मोहलत अब ख़त्म हो रही है
क्या मुझसे मिलने का वादा निभाएँगे वो !

वादा किया है मौत के फ़रिशतों नें मुझसे
वहाँ मेरी मोहब्बत से मुझको मिलाएँगे वो ।

होंठ शायर के बिना उनके अब सूख रहे हैं
अपनी मौजूदगी से ग़ज़ल किसकी सजाएँगे वो !

ज़िंदा रहते तो न नसीब हुई हमदर्दी उनकी
शायद मेरी क़ब्र पर दो आँसू बहाएँगे वो ।

भरम

जाते हुए उसे रोकना मेरा करम तो था
ख़ता माफ़ करना उसका भी धरम तो था
सच दिखाकर वक़्त नें ये अच्छा न किया
वो न सही उसके होने का भरम तो था

तहरीर

हमारे दर्द की तहरीर तो लफ़्ज़ों के परे है
उसकी उल्फ़त ने बक्शे ज़ख़्म अभी हरे हैं
क़ब्र में दफ़नाओ नहीं किताबों में उतारो हमें
हम अपनी मोहब्बत की कहानी में मरे हैं

दरार

मेरी हर रात मुझे यही नग़में सुनाती है
तू मेरे साथ मेरे ख्वाबों को रुलाती है
बंद कर दिए सभी दरवाज़े दिल के मैंने
पर दरारों से तेरी याद आ ही जाती है

तूफ़ान

इश्क़ का तूफ़ान ख़ामोशी से टल जाए
जान ही तो है आज नहीं तो कल जाए
मेरी टूटती साँस ये सवाल न कर बैठे तुझसे
दिल से गए क्या दुनिया से भी निकल जाएँ ?

सोहबत

पल दो पल के तारुफ़ को सोहबत समझ बैठे
ख़िज़ाँ-ए-वफ़ा की शाम को तोहमत समझ बैठे
मेरे नादान इश्क़ का अब गवाह बनेगा कौन ?
मोहब्बत भरी बातों को हम मोहब्बत समझ बैठे

साख

इस क़दर तड़पते हैं तेरी बात पर
नाम लेकर तेरा चल पड़े काँच पर
ज़्यादा लिखना मेरा अब मुनासिब नहीं
आँच आने न पाए तेरी साख पर

वजह

तेरे दिल में मेरे नाम की जगह न पूछ ले
मेरे इरादों पर जज़्बात की फ़तह न पूछ ले
बड़ा शातिर है ये दिल तू संभल ज़रा
मुझे सोचकर तेरे मुस्कुराने की वजह न पूछ ले

गुलाबी हुस्न

आज ग़ुलाबी हुस्न का निखरना क्या कहिये !
काजल का पलकों में बिखरना क्या कहिये !

गुलमोहर है तू शोख़ गुलशन का मेरे
उसपर चंदन सा तेरा महकना क्या कहिये !

छुआ न हो जिसे पाक़ शबनम ने कभी
आँखें चुराकर उसका सिमटना क्या कहिये !

ली हैं क़समें शराफ़त की मैंने बहोत लेकिन
तुझे देख नीयत का बहकना क्या कहिये !

क़ाफ़िला चाहतों का बस चला है अभी अभी
जवाँ दिलों से आहों का निकलना क्या कहिये !