हो तेरी आँखों में भी कभी तलाश मेरी
बसी ज़हन में जैसे ज़ख्म तू गहरी
इंतज़ार मुझे है सनम उस रोज़ का
मेरे ग़म में भी भीगे कभी आँखें तेरी
सुनती है जो शोर सारी क़ायनात का
फ़कत चीखों पे मेरी वो खो जाती कहीं
मेल अपना नहीं है कोई मेरी सदीक
बिखरे आसमाँ सा मैं तू चिड़िया शहरी
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