जो बहा लहू-ए-दिल, हमने माना, हमारा है
तुम्हारे दीद के बदले, ये नज़राना, हमारा है
जाओ ले जाओ, खुशियाँ सारी साथ लेकिन,
ये तुम्हारा ग़म-ए-हिज्र, ओ जाना, हमारा है
Tuesday, 24 September 2019
लहू-ए-दिल
सिरहाना
नींद को, तेरी गोद का, सिरहाना चाहिए
तुझसे, रोज़ मिलने का, बहाना चाहिए
साथ आ, न ठहर, रहगुज़र पर यहाँ
तेरा हर रास्ता, मेरी ओर आना चाहिए
पत्थर
मोहब्बत के नाम पर, पत्थर पूजते रहे
इसी जद्दोजहद में, शब-ओ-रोज़ झूझते रहे
ख़ामख़ा, कभी ख़ुदा, कभी ख़ुदसे रूठते रहे
हम तन्हाइयों से, उसका पता, पूछते रहे
हम रोज़, थोड़ा थोड़ा, टूटते रहे
शिरक़त
सँवरती रोज़ हो, तो शिरक़त-ए-बाज़ार भी करो
तबस्सुम-ओ-हया से लैस,नज़रें चार भी करो
आरज़ू-ए-ज़हर-ए-हुस्न-ओ-शबाब मुझे भी है
तुम थोड़ा इश्क़, थोड़ा अर्ज़-ओ-इसरार भी करो
शिकस्ता
वो बैठे हैं शिक़स्ता, दयार-ए-यार में
उम्मीद की चादर लिए, हैं मज़ार में
क़ासिद-ए-यार, आया है पैग़ाम लेकर
"उसे जुस्तजू ग़ैर की,जिसके तू इंतज़ार में"
उम्र
ख़याल-ए-रंज-ओ-माज़ी, आज फ़िर रुला गए
याद करके उसकी याद को, क्या क्या भुला गए
उसकी जुदाई में, तिश्नगी का, आलम देखिए
उस अज़ीज़, प्याला-ए-शराब में, सारी उम्र घुला गए
हालाँकि..
हालाँकि, तुझसे शिकवों की इजाज़त नहीं है
पर बारज़ा कुछ भी करना, मेरी आदत नहीं है
है खटका, मुझे तेरे ख़फ़ा होने का
तुझे न छेड़ना, मेरी शराफ़त नहीं है
है शायरी में, कितनों को डुबोया तूने
मुझे अपनी हालत से, हैरत नहीं है
हूँ ज़िंदा ज़रूर तेरे, बग़ैर भी लेक़िन
ये झूठ होगा कहना, कि तेरी ज़रूरत नहीं है
भीगे तकिये गवाह हैं,अफ़्सुर्दगी के मेरे
मैं कह कैसे दूँ कि, तुझसे मोहब्बत नहीं है
तस्वीर
बंद आँखों से, किसी तस्वीर को निहारा करते हैं
हाँ धुंधली सही, किसी तरह गुज़रा करते हैं
ख़ौफ़-ए-हिज्र में, किसी साए को दूर जाते देख
नींद से उठ उठकर, जाने किसे पुकारा करते हैं
सबब
"सबब क्या हो सकता है, किसीके यूँ टूटने का ?
सूरत-ए-यार पर लिखी, लकीरों के रूठने का ?"
बस एक दफ़ा ख़बर लेकर, मुह मोड़ लिया हमसे
हम इंतज़ार करते रहे, उनके दोबारा पूछने का
कुछ यूँ की मोहब्बत...
कुछ यूँ की मोहब्बत, कि हद से गुज़र गए
एक उसकी ओर चलना याद है, फ़िर जाने किधर गए
इतनी शिद्दत से किया हमने, गुनाह इश्क़ का
ऐसी ख़स्ता हालत देख, हमारे फ़रिश्ते मुकर गए
उसके दिल के निकाले हम, आवारा हो गए
फ़िर जिस दर पे मिली पनाह, उस दर गए
उसके घर ने समझा जैसा, नहीं बेग़ैरत वैसे हम
लानत है हमपर, उस गली दोबारा अगर गए
जो शर्मिंदा हुए बहोत, महज़ मौजूदगी से हमारी
जाओ कहदो उन रसूखदारों से, कि हम मर गए
माज़ी
साया-ए-माज़ी में, अब तन्हा रहना छोड़ दिया
रफ़्ता रफ़्ता, ग़म-ए-उन्स सहना छोड़ दिया
सुन न सकी वो, लाख सदाओं के बावजूद
मैंने भी अब, कुछ भी कहना छोड़ दिया
मेरे हाथ, तेरी दुआओं में उठें क्यों भला
ऐ ख़ुदा, तूने भी उसके दिल में रहना छोड़ दिया
तेरी ओर तकते हैं, शिकस्ता कभी कभी
अश्कों ने जब उस ओर, बहना छोड़ दिया
तू क्या जाने, उस लिबास के सिलवटों की दासताँ
तूने तो बस कुछ रोज़ पहना, छोड़ दिया
ख़याल
जिसे सोचे बग़ैर, नहीं रह पाता हूँ मैं
क्या उसके ख़यालों में भी, कभी आता हूँ मैं !
तेरी आँखों नें कभी, मेरी राह नहीं देखी
ऐ बेख़बर, अब न पूछ कहाँ रह जाता हूँ मैं
कहीं दूर छोड़ आया, तेरी सोहबत को मैं
लोगों को भीड़ में भी, तन्हा नज़र आता हूँ मैं
नज़रें ग़मज़दा हो जाती हैं, तेरी याद में
सारी रस्में उल्फ़त की, अब भी निभाता हूँ मैं
फ़िराक़-ए-यार में, ख़ुदका कद्रदान हो गया
हर रोज़, थोड़ा थोड़ा ख़ुदको कमाता हूँ मैं