Tuesday, 13 November 2018

प्यार

सच्ची मोहब्बत को ज़िंदगी आज़माती है
हर मोड़ पर, हर दौर में क़िस्मत सताती है

समझ सको उसकी चुप्पी में छुपा शोर तुम
बेचैनी में अगर उसको रात लम्हें जगाती है

उसके होठों को छू कर ज़ुल्फ़ों में हाथ फेरो
तुम्हारी गोद में सर रखकर जो सबकुछ भूल जाती है

ख़्वाहिश तुम्हारी हो अगर बारिश को चूमने की
वो ख़ुदको भूलकर भीगने तुम्हारे साथ आती है

अपनी झुकी निगाहों से सदा सजदा करो उसका
तुम्हारे पाँव की मिट्टी वो अगर माथे सजाती है

अश्कों से सींचो वफ़ा के दरख़्त को तुम
हालातों के थपेड़ों में ये शाख़ें अक्सर टूट जाती हैं

बोझ

इन हसीं हाथों से ये बोझ उतरा नहीं
पर तेरे चहरे पर शिकन भी ज़रा नहीं
कहाँ गयी मेरी आँखों से ओझल होकर
तेरे दीदार से दिल अभी भरा नहीं

मंदिर और भगवान

सुना है दोस्तों मेरे भगवान ने मंदिर बदल लिया
मुनासिब ही होगा अगर उसने ये अदल किया
होगी अदा नमाज़ अब तेरी यादों की रहगुज़र पर
सिर्फ़ तेरी थी तूने जिस इबादत का क़तल किया

Monday, 5 November 2018

नगीना

तेरी ज़िंदगी में तारीख़ सा गुज़र जाऊँगा
तय नहीं, शायद इज़हार से मुकर जाऊँगा

ये दिल है मोतियों की माला सा नाज़ुक
तेरी हथेली की पनाह में बिखर जाऊँगा

आ बैठें किसी बगीचे में बेफ़िक्र होकर
दिलों का कुंभ नहीं ये जो बिछड़ जाऊँगा

खड़ी होकर नीचे से बस आवज़ तू देना
मैं अपने क़िले के ज़ीने से उतर जाऊँगा

मुझसे दूर होने की तू झूठी कोशिश न कर
मैं संगदिल हूँ लेकिन यहाँ सिहर जाऊँगा

तू घटा बनके जिधर चाहे बरस जाए
मैं तेरे साए की तलाश में उधर जाऊँगा

सिर्फ़ हाथ नहीं प्यार से भी बना मुझको
तेरे बालों का जूड़ा नहीं जो बिगड़ जाऊँगा

तू मेरी अंगूठी का वो नायाब नगीना है
जिसे चख कर किसी रोज़ मैं मर जाऊँगा

ज़ाती मोहब्बत

मेरे ख़ुदा की तू ज़ाती मोहब्बत है
इनाम ख़ास मेरा ये तेरी सोहबत है

सामने रख़कर तुझे लिखूँ तुझी को
सजे ग़ज़ल ये अगर तेरी इजाज़त है

पिघल गया जिस हाथ की छुवन पर
मेरे पत्थर दिल पर ये तेरी लिखावट है

रखा जो यौवन संभाले बरसों से तूने
हैरत नहीं माशूक़ ये तेरी हिफ़ाज़त है

नशा उतरा पर ख़ुमारी उतरती नहीं
तेरे आघोष में रहकर की तेरी इबादत है