Friday, 27 July 2018

ज़रूर

तू पढ़ न पढ़ मैं लिखुंगा ज़रूर
तू कह तो सही मैं सुनूंगा ज़रूर

निभा सके न तू शायद वादा तेरा
तेरे इंतज़ार में मैं रुकूंगा ज़रूर

तू तय तो कर मेरे अश्कों की क़ीमत
मुझे तेरी क़सम मैं बिकुंगा ज़रूर

हुआ रूबरू अगर मैं ख़ुदा से कभी
तुझे दोबारा ऐ सनम मैं मांगूंगा ज़रूर

तलाश हो कभी तुझे बावफ़ाओं की
मेरी आँखों में देख मैं दिखूंगा ज़रूर

है ये मर्ज़ी तेरी तू भूल जाए मुझे
लेकिन ज़हन में तेरे मैं रहूंगा ज़रूर

हम यहाँ न मिल सके तो रुसवाई कैसी!
इस ज़िंदगी के परे मैं मिलूंगा ज़रूर

ख़ुदा सुने न मेरी तो न सही दिलबर
तुझसे शिकाक़त तेरी मैं करूँगा ज़रूर

Monday, 23 July 2018

नज़र के उसपार

नज़र के उसपार मुझे तेरा इंतज़ार न था
आज पहली दफ़ा ये दिल बेक़रार न था
जब तन्हाई में मायूसी की इन्तेहाँ हो गयी
मेरे अश्कों में ग़म-ए-उन्स का इक़रार न था

Saturday, 14 July 2018

एक अच्छी लड़की

तुम अच्छीं ज़माना अच्छा एक हम ही बुरे हैं
तुम और तुम्हारा इश्क़ मुक़म्मल एक हम ही अधूरे हैं
तुम्हारी सीरत के ख़ातिर ज़िंदा हैं ज़मीं पर हम
हवस सूरत की होती तो जन्नत में भी हूरें हैं

शबनम-ओ-रुख़सार

सहर की शबनम में तेरा चहरा पाया है
तेरी अंजुमन में जवाँ शाख़ों का पहरा पाया है
हैं जुस्तजू में क़ुदरत की ठंडी आहें मुसलसल
तेरी आहट से मैंने वक़्त को ठहरा पाया है

Tuesday, 10 July 2018

कूह-ए-यार

एक रोज़ मेरा यार मिल गया मुझे
बिन कहे बहुत कुछ कह गया मुझे

"होंगे न जुदा कभी" ये कहता था मगर
अनजाने ही उस शाम सच कह गया मुझे

रुक गया कुछ रोज़ मैं भी कूह-ए-यार में
नशा उसके शराब का सर चढ़ गया मुझे

आख़िर कबतक गवारा करता वो गुनाह मेरे
तंग आकर एक रात बेदख़ल कर गया मुझे

दिलदार यार नें माफ़ कर दिया लेकिन
न चाहकर भी दिल से वो बाहर कर गया मुझे

Saturday, 7 July 2018

तेरे दर से

जो तेरे दर से भी ठुकराया गया हो
शब-ए-फ़ुरक़त में बहोत तड़पाया गया हो
मुस्कुराता है बंदा दर्द से नज़रें मिलाकर
जैसे बीते वक़्त में बेहद आज़माया गया हो

लहू इश्क़ का

रिस रिस कर बहे है लहू इश्क़ का
सिसक सिसक कर कहे है लहू इश्क़ का
दिल तोड़ती हैं बातें सनम की आज भी
हर दफ़ा ये ग़म सहे है लहू इश्क़ का

किताब

अपनी आँखों में मेरी कहानी पढ़ले
मेरी ज़िंदगी के पन्ने अपने नाम करले
तेरी दुनिया में नए क़िरदार ही सही
नए लफ़्ज़ों की तरह हमे शामिल करले