Wednesday, 26 June 2019

अब क्या बात करें तुझसे....

अब क्या बात करें तुझसे, कहने को कोई बात नहीं
कुछ अनकही हैं बातें ज़रूर, लेकिन वो आज नहीं

आग़ाज़ मेरे ग़ज़लों का, मेरे शेर का अल्फ़ाज़ तुही
बिन तेरे ये कागज़ कोरे हैं, इन नज़्मों में जज़्बात नहीं

करलें खुलकर बात कई, बैठें कभी हम साथ कहीं
यूँ चैन नहीं तेरे दिल को, मेरी आँखों में भी रात नहीं

वो करें कैसी भी बात मेरी, मैं अच्छा सही मैं बुरा सही
मेरा सबकुछ है मालूम तुझे, हाँ तुझसे कोई राज़ नहीं

वो oreo तेरा देना मुझको, पर butter scotch मुझे रास नहीं
नहीं होगा कुछ वो याद तुझे, पर छोड़ो कोई बात नहीं

जुस्तजू

यूँ तो कहने को साथ जहाँ होता है
जुस्तजू जिसकी वो जाने कहाँ होता है
मैं उसकी सूरत से नज़रें न फेरुँ कैसे!
जिसके दीदार भर से दर्द जवाँ होता है

रहगुज़र

मोहब्बत में मोहब्बत पर, था ऐतबार बहोत
किसी की याद में, हुए हम भी बेक़रार बहोत
थाम कर हाथ मेरा कोई साथ ले गया वरना,
किया करते थे, तन्हा रहगुज़र पर इंतेज़ार बहोत

सोहबत

इश्क़, दो दिलों की सोहबत है, जताई नहीं जाती
ये आग, ख़ुद ब ख़ुद लगती है, लगाई नहीं जाती

वो जब तकती है एकटक, किसी की ओर
फ़िर उस शख़्स से, ख़ुशी उसकी छुपाई नहीं जाती

वो आँखों से पूछती है, क्या मेरे नहीं हो तुम ?
मुझसे अक्सर दिल की, बात मेरे बताई नहीं जाती

वो जब बैठी थी परसुकूँ, आंगन में मेरे
उसकी वो याद, यादों से, भुलाई नहीं जाती

जाने क्या लिखा है, उसकी ज़ुल्फ़ों की क़िस्मत में
साया करती ज़रूर हैं, पर मुझपे छाई नही जातीं

चुनरी

तुझपर लिखे शेर, यूँ कलाम हो जाएँ
उनके ज़िक्र भर से, तू गुलफ़ाम हो जाए

एहतियातन रख, मेरी बाँह पर सर अपना
तेरी झपकी ज़माने भर में न बदनाम हो जाए

मेरे कदमों में सनम, उम्र भर की थकान है
तेरी चुनरी की छाँव में, ज़रा आराम हो जाए

तेरी चुप्पी कुछ कह गयी, मैं सुने बगैर समझ गया
ये तेरा मेरा राज़ है, कहीं सरेआम न हो जाए

सहर से हर रोज़, बस इल्तिजा यही रही
पनाह में तेरे गोद की, मेरी शाम हो जाए

ख़लीसी

हूँ गुनहगार मैं तेरा, जो चाहे सज़ा दे
ख़ुदसे जुदा न कर, हाँ सूली चढ़ा दे

वीराँ वादियों में, तेरा यूँ खिलकर निकलना
नम आंखों से, मुस्कुराने की मुझे भी अदा दे

नाचीज़ को तेरे नाम के, ज़ख्म अज़ीज़ थे
बहते लहू को, मेरे वफ़ा के, किस्से सुना दे

वो उल्फ़त भरी तुझसे, नज़र न मिल सकी
साथ लड़ने, तेरी ख़ातिर, मरने की रज़ा दे

न चाहिए, सिवा इसके, मुझे कुछ 'ख़लीसी'
पल भर तू, मेरी लाश पर आँसू बहा दे

वस्ल

ये मोजज़ा, शब-ए-वस्ल पे, हुआ न करे
भरे जहाँ में, कोई सहर की, दुआ न करे
शर्म से मर जाती हूँ, जिसकी नज़र भर से
वो अक्सर पास तो आए, मगर छुआ न करे