Friday, 14 February 2025

पहन

मुझे पहन, मुझे ओढ़, मुझे लेले आग़ोश में
आँखे मूंद कर मेरा नाम ले, रहना न होश में

अपने पाँव, मेरी कमर में लपेट कर
ताज महल अपने दोनो, मेरे सीने पे थोप दे 

उसे नीलाब कर दे , अपनी ज़बाँ से लगा कर
मुझे खूब निचोड़, कर मेरा आब - नोश ले

उसे गले से उतारकर, होठों से चूम ले
फिर मेरे पॉप्सिकल को, अपनी आकृति में दबोच ले

आगे पीछे होने दे, मुझे ताज महल समेटने दे 
तुझपे सवार हो जाऊँ, तू मेरी पीठ खरोच ले

अपने हाथों से अंदर रख ले, जो फिसल जाए 'निसार' 
रह रह के आह भर मेरी जाँ, ज़ोर ज़ोर से खुरोश दे

आईना

आईना देखता हूँ, तो याद आती है
आँखें बंद करता हूँ, तो याद आती है

अकेला होता हूँ, तो यहाँ रह रहकर
तुम बिन जीता हूँ, तो याद आती हैं

मरता था आरज़ू में, मरने की
अब तुम पर मरता हूँ, तो याद आती है

एक रोज़ बैठे थे, नाव पे हम दोनों 
अब नाव देखता हूँ, तो याद आती है

कई शामें गुज़री हैं,तेरे साए में 'निसार'
दरख़्त की छाँव देखता हूँ, तो याद आती है

लकीर

लकीर अपने नसीब की, मैं पीटता रह गया
लाश अपने ख़ुश-फ़हमीयों की, खींचता रह गया
कोई सदा न आई लौटकर, उस पत्थर से 'निसार'
मैं बस एक हाशिए पे खड़ा, चीखता रह गया

नसीब

ज़ह-ए-नसीब, उसकी गली तुम, अगर जाओ
उस कमर-ए-समंदर, की झलक, अगर पाओ
अब कुछ और, सज़ा-वार-ए-दीद, नहीं साहब
ख़ुदाया इश्क़ करो उससे, और बस, मर जाओ

आज़ाद

ज़ुल्फ़ बिखरा के, तुम दिन को रात करती हो
सिर्फ़ ज़बाँ से नहीं, आँखों से भी बात करती हो

आवाज़ो से भरे, मेरे दिल की महफ़िल में
अपनी बोली से, शोर को सुकात करती हो

भली सी सूरत, प्यारी आँखों से लैस होकर भी
मेरे नाज़ुक से, भोले दिल पे रि'आत करती हो

चाहता हूँ कि तू आए, और उम्र भर न जाए कहीं
मेरी छोटी सी दुनिया को, तुम आबाद करती हो

एक निगाह डालकर 'निसार' को क़ैद कर दिया
फिर एक और नज़र से, मुझे आज़ाद करती हो

गाह

मेरे दिल में, अज़ली गाह मुबारक़ हो
तुझे सारी ख़ुशियाँ, अथाह मुबारक़ हों

हसीं चहरे की, चमक मुबारक़ हो
तुझे, मेरी पिहू, ये सालगिराह मुबारक़ हो

थके पाँव, तीखे नाख़ून, आतिशीं सदा 
तुझको, उजली सीरत, आँखें स्याह मुबारक़ हो

भँवर सा रुख़, ज़ोहरा-जबीं, मेरी सजनी तुझे
नम होठों की जगह, ये अक़दाह मुबारक़ हो

काम कमान भवें,ये लहरों सी पलकें तेरी
मुझे ऐ 'निसार' तेरी बाँह, सारे गुनाह मुबारक़ हो

गुरूर

क्या उसीको रुस्वा किया, जिसका ग़ुरूर बनना था ?
कहाँ अस्ली बन बैठा ? मुझे तो बा-शु'ऊर बनना था !
तुम हैरान क्यों हो ? तुम तो मुझे जानती थी न !
मुझे मरहम बनना था 'निसार', न कि नासूर बनना था