वो जो कल हमारा था, अब पराया है
हमनें उसे नहीं, उसने हमें गँवाया है
हमें किसी ने, उस रोज़, पुकारा ज़रूर था
अब हम नहीं जानते, उसने किसे बुलाया है
न भेजे ख़ुदा हमें, सौगात बारिशों की
हमनें अश्क़-ए-फ़िराक़ से, दामन भिगाया है
आज, ख़ुद ही को हम, रास नहीं आ रहे
हमसे कोसों दूर खड़ा, हमारा साया है
कैसे, कहें उसे, जिसे ख़ुदा बनाया था
हमनें वफ़ा के मंदिर से, पत्थर चुराया है