Saturday, 20 April 2019

फ़िराक़

वो जो कल हमारा था, अब पराया है
हमनें उसे नहीं, उसने हमें गँवाया है

हमें किसी ने, उस रोज़, पुकारा ज़रूर था
अब हम नहीं जानते, उसने किसे बुलाया है

न भेजे ख़ुदा हमें, सौगात बारिशों की
हमनें अश्क़-ए-फ़िराक़ से, दामन भिगाया है

आज, ख़ुद ही को हम, रास नहीं आ रहे
हमसे कोसों दूर खड़ा, हमारा साया है

कैसे, कहें उसे, जिसे ख़ुदा बनाया था
हमनें वफ़ा के मंदिर से, पत्थर चुराया है

शैदाई

छलकते हुस्न से, शैदाई को भिगोया नहीं करते
खुद ही को देख दर्पण में, खोया नहीं करते
ये शातिर चाँद चुपके से, तुझको देख लेता है
दरीचे खोलकर, ऐ बेपरवाह, सोया नहीं करते

बद्दुआ

हाँ ज़्यादा माँग रहा तुझसे, मेरे ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा न हो
तुझे चाहने का गुनाह किया, तुझे चाहने की सज़ा न हो

वो लकीरें तेरे जिस्म पर, कर्ज़दार हैं मेरी हथेली की
तेरा बदन वो कुछ कहे नहीं,  जिसमें मेरी रज़ा न हो

दिलकश तेरी शामें, जो पिरोए हैं तूने ख़्वाब में
ख़ाली तेरा दामन रहे, वो रस्म कभी अदा न हो

नग़मों में मेरे सदा तेरी, मेरी हार थी तेरी दुआओं में
मुझे रोता छोड़ जाने वाले, तुझे खुशियाँ कभी बदा न हों

अश्कों के शबनम लेकर,दिए काँटे मुझे नसीब में
तुझे सहरा की धूल मिले, वहाँ तेरा कोई सगा न हो

जाहिल

अगर तुझे न पढ़ सका, तो जाहिल ज़रूर हूँ
थोड़ा सही, तेरे जलवों के क़ाबिल ज़रूर हूँ

वो जो भीड़ उमड़ती है, तेरे दीदार को
उस लम्बी क़तार में, मैं भी शामिल ज़रूर हूँ

फ़िदरत तेरी है, सभी को इश्क़ नवाज़ना
आँखों में बसी चाह, और आमिल ज़रूर हूँ

तेरे जिस्म की आग में, भीगा क्या एक दफ़ा
लहरों की राह में खड़ा, साहिल ज़रूर हूँ

कोई आया शहर में, और ग़ज़लें सुना गया
तेरी मोहब्बत बाँटता, मैं वो राहिल ज़रूर हूँ

कारवां

मंज़िल न रही, फ़िर कारवाँ का बहाना न रहा
लुटे मुसाफ़िर का, कहीं और ठिकाना न रहा

उसकी महफ़िल में, वफ़ाओं का हिसाब था
मेरे ग़मों का, मगर कोई पैमाना न रहा

ख़ाली कर गई, सभी अहसासों से वो मुझे
इस घर में, फ़िर किसी का आना जाना न रहा

लिखे क़िस्से कई, नम पलकों की स्याही से
कहने को मगर, अंत में कोई फ़साना न रहा

मुझे उसकी, और उसे ज़माने की कशिश थी
मैं उसका नहीं, और मेरा ज़माना न रहा

इक़रार

ऐ, गुनाह-ए-इश्क़ के, इक़रार से मुकरने वाले
नज़रें झुकाकर, मेरे पहलू से गुज़रने वाले
सादगी ही, तेरा असल श्रृंगार है, पगली !
पलकों पे सुलाकर, मेरे ख़्वाब में सँवरने वाले

चहरा

हुई मुद्दत, आईने में उसका चहरा देखे
अपनी आँखों में, उसके अक्स का पहरा देखे

वो नदी बनी, मैं राह का पत्थर न हुआ
मुझे गवारा न था, लोग उसे ठहरा देखें

असल तह, मल्लाह को मिलती नहीं कभी
दरिया-ए-यार में, वो कितना भी गहरा देखे

गिला नहीं, के उसे वीराने पसंद नहीं मेरे
वो सावन की आदी, क्यों भला सहरा देखे

शब को, सहर से एक इल्तिजा ज़रूर है
वो दोबारा उसे, अपने लिए महरा देखे

बे क़ादरी

न पहला था, न मैं हूँ आख़री
जब सैकड़ों फ़ना फ़िर क्या मेरी हाज़री
राह-ए-उल्फ़त में सीखा ज़रूर इतना
अर्ज़, अश्क़ और अरमां हैं बे-क़ादरी

ख़ामी

वो जो हमारी ख़ामियों के क़िस्से सुनाया करते हैं
चुपके से अक्सर वही अकेले में बुलाया करते हैं
हमारी नज़रों के साए को कोई दिल्लगी न समझे
हम आँखों में झाँककर दिल को चुराया करते हैं

लत

गुल सूख जाएँ तो भी महक रूठती नहीं
साँस टूट कर भी इश्क़ में टूटती नहीं
कोशिशें तमाम की उसे भूल जाने की
पर लत हुस्न की है साहब छूटती नहीं

गुनाहगार

आशिक़ शिकार वो ही गुनहगार हो जाए
ख़ातिर इंसाफ़ के वो अब किसके दर जाए
एहतियातन सुनाओ गैरों को दास्ताँ अपनी
कहीं ज़बाँ पर उसका नाम न आ जाए