आँखें नशीली किसी बहते शराब सी होठ रसीले जैसे कली हो ग़ुलाब की तेरे रुख़सार ने संजोए हैं राज़ बहोत खूब है पहेली तू आला दर्जा बंद क़िताब सी
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