यादों के अंगारों में तेरी राख़ ढूंढता हूँ
तोड़ लाऊँ जहाँ लम्हे वो शाख़ ढूंढता हूँ
मैं ढूंढता हूँ तुझे हर एक चेहरे में
हर तहरीर में मैं तेरी छाप ढूंढता हूँ
धुल जाएँगे सारे ग़म किसी को पता चले बग़ैर
तू अश्क़ पहचान न पाए ऐसी बरसात ढूंढता हूँ
तेरे आसमाँ के साए से आख़िर छुपूँ मैं कबतक ?
तेरा ज़िक्र न हो जिस बात में वो बात ढूंढता हूँ
हारते थकते वो अपने यादों के परिंदे
मिल जाएँगे जिस ख़ाक में वो ख़ाक ढूंढता हूँ
चढ़ी सूली पर मेरी उल्फ़त जिस कानून के चलते
तेरी रंजिश भरी आँखों में वो इंसाफ़ ढूंढता हूँ
निकल जाए सीने से तेरा नाम लिए बग़ैर
मैं आज भी पुरज़ोर ऐसी साँस ढूंढता हूँ
फ़ना हो जाए बंदा जिस इबादत के सदक़े
मैं काफ़िर तुझमें वो मक़सद पाक़ ढूंढता हूँ
बंद है उँगलियों में तेरे जिस्म की दस्तक़
खो चुके तजर्बों में वो अहसास ढूंढता हूँ
टूट जाए कोई बादल भी मेरी सहरा के ख़ातिर
मैं हर शख़्स में मेरे लिए वो प्यास ढूंढता हूँ
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