हमारी तक़दीर के सवालों का रुख मैं मोड़ दूँ ज़िंदा रहने की बिना तेरे सारी उम्मीदें छोड़ दूँ न जाए रुस्वा होकर कभी तू कब्र से मेरी जुदाई में तेरे आँचल का यूँ कफ़न मैं ओढ़ लूँ
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