Monday, 17 October 2022

रहगुज़र

समंदर और साहिल सा, याराना था जिससे
अश्क़ बहते नहीं थे, ग़म बेगाना था जिससे

मैं उसकी आँखों से आँखें, मिला नहीं रहा
आँखों में डूबकर, ख़ुदको मिलाना था जिससे

मंज़िलें अलग, रास्ते जुदा हो गए
सारी उम्र साथ बैठकर, बतियाना था जिससे

दिल में उसके नाम के, रंज पाले हुए हूँ 
सदा ख़ुश रहने का वादा, निभाना था जिससे

क्या इतनी दूर आ गए 'निसार', के लौट न सकेंगे ?
रहगुज़र पर मैंने, दामन छुड़ाया था जिससे

शनाख़्त

ऐ दोस्त, तेरी शनाख्त से मुकर गया हूँ मैं
सुना है, सर-ब-सर तुझपर गया हूँ मैं

साथ तेरे जान-ए-जाँ, सुकूँ की तलाश में
मैं टूटा, बना, फ़िर बनकर बिखर गया हूँ मैं

जिस राह पर, तन्हा छोड़ आगे बढ़ चली तू
एक अरसे से, मेरी जाँ वहीं ठहर गया हूँ मैं

जज़्बात नहीं आँखों में, दिल में अशफ़ाक़ नहीं
पत्थरों के इस शहर में, जाने किधर गया हूँ मैं

'निसार' एक समंदर, आँखों में समेटकर
गले तक, मेरे दिल सा भर गया हूँ मैं

पैराहन

उनके मुँह से भी, वफ़ा के ज़िक्र निकल आते हैं
वो जिनके पैरहन, हर नए रोज़ बदल जाते हैं

तेरी आवाज़ पर, मेरा मुड़ना याद तो होगा
अब तेरी आहट भर से, रास्ते बदल जाते हैं

जो मुझपे गुज़री, वो गुज़री मगर ऐ दोस्त
मेरे अश्क़, पानी पर गिरते ही जल जाते हैं

तुझसे मिली मायूसी और नाउम्मीदी के तले
तू क्या जानो, लोग कैसे कुचल जाते हैं

तेरे झूठे वादों और बातों से वाकिफ़ हूँ मगर
दिल बहल जाता है, दिन गुज़र जाते हैं

चार क़दम साथ चलकर ही, लौट आए
वो जो कहते थे, चल 'निसार' अजल जाते हैं

नागवार

मेरी आदतें नागवार और मेरा साथ तो सज़ा था न !
तुमसे हारने पर ये सलूक क्यों? तुमसे जीतना तो ख़ता था न !
मेरा अपने भीतर झाँकना, तुम्हें हर सितारे में देखना
तुम क्यों न ये सब समझ सकी ? तुम्हें तो सब पता था न !

बातें

वादा, वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या !
कच्चे धागे से ना-तुवाँ, इन नातों का क्या !

ग़ुलाब टूटा भी, तो गेसुओं में जा लगा
गुलों के मुहाफ़िज़, इन काँटों का क्या !

वो कहती है, कि हमारी दुनिया अलग है
बरसात की गवाही में, उन छातों का क्या !

मेरी आँखों में, तुझे सारे जवाब मिल गए
इन गीली आँखों से, बहते सवालातों का क्या !

'निसार' तेरे कहने पर, आँख बंद भी करले
पर आसेब से लैस, डरावनी रातों का क्या !

बेगाना

यहाँ क़ायल, जिसका सारा ज़माना रहा
अब मेरे शहर में, न उसका ठिकाना रहा

धागे सारे तोड़ गई, चंद अल्फ़ाज़ों में
वो शख़्स, जिससे सालों का याराना रहा

मेरे ज़हन में, वो दरिया सी बहती रही
मैं भँवर में फँसा, देखता किनारा रहा

दरम्यान हमारे, एक खोखला छलावा रहा
सर-ए-राह, मेरे दरपेश एक ग़ुबारा रहा

पता चला है जिसे, अज़ीज़ लिखता था 'निसार'
मैं ता-उम्र, उसकी किताब में बेगाना रहा 

राहगीर

पास आकर, एक दूजे से लिपट जाते हैं
दो राहगीर, एक ही ठाँव में सिमट जाते हैं

उसकी ज़ुल्फ़ों से खेलकर ये हाथ मेरे,
उसके गालों तक, आके झिझक जाते हैं

शर्म-ओ-हया में उसके झुके चश्म जब,
उठते हैं तो, साग़र सा छलक जाते हैं

उसके होठों की सतह पर ये सर्द शबनम,
उसके कंधे के, पल्लू सा सरक जाते हैं

ये बारिश, फ़िज़ाएँ हैं जो उसपे 'निसार'
बस उसके बदन को छूकर, बहक जाते हैं

शोर

हाँ हैं कुछ जो माथे पर, चंदन सा सजाए जाते हैं
हैं कुछ जो सूखी टहनी सा, चूल्हों में जलाए जाते हैं

ठोकरों से हम पत्थर, टूट टूटकर ख़त्म हुए
कुछ शौक़ीनों की ख़ातिर, बेवजह सताए जाते हैं

हर फूल नहीं ख़ुशक़िस्मत, की भगवन के गले का हार बने
हैं कुछ ऐसे भी जो मसलकर, पैरों तले दबाए जाते हैं

दुहाई कि सुनवाई नहीं, न उसके घर इंसाफ़ है
बावला बनाकर हम, फ़िर तमाशा बनाए जाते हैं

मर क्यों न जाए 'निसार', अपनी स्याही में डूबकर
हर सितम पर ये शायर लोग, क्यों शोर मचाए जाते हैं !

मरहम

मरहम नहीं नासूर पर, मेरा इलाज कोई दुआ नहीं
तेरी नसीहतों का मैं क्या करूँ, ये नसीहतें कोई दवा नहीं

किस हक़ से तुझे बुलाऊँ मैं, क़रीब अपने बिठाऊँ मैं
मेरे सीने की साँस सा, तू पास होकर भी मेरा नहीं

बातें होनीं थीं कितनी, मिलाकर आँखों से आँखें
ये अंजाम हुआ तेरे वादों का, कि कुछ भी हुआ नहीं

कीचड़ से कालिख़ में, था लिपटा हुआ कंवल
छाए बादल कई आसमाँ में, पर बारिश नें छुआ नहीं

हारकर 'निसार', मात का, इज़हार नहीं कर सकता
होना था गले का हार मुझे, तेरी शानों का सुआ नहीं

पंछी

ऐ बेदर्द, मुझ मुफ़लिस पर, ये अज़ाब न कर
परों को नोच कर, पंछी को आज़ाद न कर

खोखले, दरख़्त-नुमा तअल्लुक हैं, बह जाएँगे
बाढ़ के मौसम में, यार ये मज़ाक़ न कर

तेरा चहरा ही सूरज है, इन दिल के अंधेरों में
हाल पूछकर, फ़िलहाल मुझे नाशाद न कर

मदावा न सही लेकिन, तेरा होना भी राहत है
मैं मर जाऊँगा, मेरी बीमारी का इलाज न कर

बा-समर शाख़ का, लचक जाना है लाज़मी
पर आरज़ी दिल्लगी में, 'निसार' मुझे बर्बाद न कर

कलम

चूम कलम को लबों नें, तेरी सीरत को बयाँ किया
पहलू में बिठाकर तुझे, अपना शेर सुना दिया

गाहे बगाहे डोर में, जो गिरह भी अगर पड़ी
तपती ज़मीं को बारिश सा, हमनें मना लिया

ज़रिया जो भी अख़्तियार कर, मंज़िल का
राह में यूँ निबाह हो, कि लगे सबकुछ कमा लिया

सितमगरों के सितम से, पथरा गया जो शख़्स
उसको ऐ दोस्त, तेरी नवाज़िशों नें रुला दिया

हथेली में हाथ रखकर, जो बंदिशों में नहीं रहा
वो दिल में रहा, और उसे आँखों में बसा लिया

वो आख़री मुलाक़ात को, जो आए दर पर मेरे
अश्कों से पाँव धोए, तबस्सुम से विदा किया

ग़म-ए-हिज्र जताना भी, ज़रूरी नहीं 'निसार'
ये भी तो कम नहीं, कि यादों में सजा लिया

साया

क्या जानते हो, कि कितना कुछ नहीं जानते तुम !
मैंने कहा, मैं वो नहीं हूँ, पर नहीं मानते तुम !

दम घुटने लगा तुम्हारा, मेरे साए भर में ही
और तुम्हारा दावा है, कि हो मुझे पहचानते तुम !

ज़मीन

तेरे दिल, ज़हन, दिमाग़ में कहीं नहीं हैं हम
जहाँ तू छोड़कर जाती है, वहीं कहीं हैं हम

सोचना ज़रूर चाहते हैं, हम ख़ास हैं तेरे
पर जानते हैं, इस बार सही नहीं हैं हम

आँख नम नहीं तेरे, मेरा हाल देखकर भी
इतना बता, क्या तेरे कुछ भी नहीं हैं हम

जिन यादों को याद कर, तेरे होंठ मुस्कुराएँ
यार क्या बताएँ, बस वहीं कहीं हैं हम

एक दिल भी बसता है, इस जिस्म के भीतर
'निसार' सिर्फ़, तेरे शग़्ल की ज़मीं नहीं हैं हम

दरिया

कोई दरिया, जैसे समंदर में खो गया
तुझसे जो भी मिला, तेरा ही हो गया

होठों पर छाले, और आँखें झुलस चुकीं
सहरा में, तेरी साया-ए-शजर में सो गया

अज़ल से तपिश में, साहिल पे खड़ा हूँ
एक मौज आया मेहरबाँ, और पाँव धो गया

मेरे अश्कों के मोती, हथेली में समेटकर
अपने नाम के, हर्फ़ की, तस्बीह पिरो गया

ज़हन चाँद और आँखें, सूरज हैं जिसकी
मैं 'निसार' ऐ दोस्त, तेरा मुहाजिर हो गया

वजह

न पूछ मेरी बेरुख़ी की वजह, 
मेरे यार मैं कुछ कहूंगा नहीं

न देख सवाली निगाह से मुझे, 
मेरे दोस्त मैं सह सकूंगा नहीं

तेरे पहलू में ही बैठा रहा वो शख़्स, 
जिसे कभी अपना कहा था तुमने

जिस सोहबत में मिलती तवज्जोह नहीं, 
ऐसी रफ़ाक़त में 'निसार' मैं रहूंगा नहीं

अख़्तियार

तन्हाई में मुझपर, बहोत अख़्तियार करता है
पर सर-ए-महफ़िल, मेरे वजूद से इनकार करता है

अगर इतना बुरा हूँ, तो नाते तोड़ ले मुझसे
क्यों अहद-ए-वफ़ा, की मुझपे फुवार करता है

वो बात नहीं करता, ज़ालिम रस्में निभाता है
दोस्त बनकर, दोस्ती का कारोबार करता है

जो सबका हो शैदाई, वो किसीका नहीं होता
गले लगकर, लिए नश्तर, तार-तार करता है

क्योंकर बने 'निसार', पशेमानी का सबब तेरे
कह दे हौसला नहीं, क्यों बहाने हज़ार करता है !

बियाबान

उस मुसाफ़िर को, इस बियाबां में एक राह मिली
तू मिला, तो उस सहरा को, समंदर में पनाह मिली

ख़ून-ए-जिगर निकाल कर, लिखता था पन्नों पर
हमदर्दी की दरकार थी, पर बस वाह वाह मिली

मेरे ज़िंदाँ-ए-ज़ात में, तू आई इस तरह, की
बाद स्याह रात के, बाद-ए-सबा-ओ-ज़ुहा मिली

संग-दिलों कि संग-ज़नी, और खूँटे से बँधा वो
मुक़द्दर के मुजरिम को, तेरे दर पर फ़लाह मिली

बेकसी नाम का, एक राहगीर था 'निसार', जिसे
उस ओर जाना था, और तुझसी मल्लाह मिली

जानिब

मुझमें वो सारा का सारा,पर उसमें मेरा कुछ भी नहीं
उसकी जानिब सारा जहाँ और कोई मेरा कुछ भी नहीं

जो कहता था मोहब्बत में, ख़सारा ही नहीं होता
उसकी ओर देखा, मैं हँसा, पर कहा कुछ भी नहीं

एक अरसा जिसके पहलू में, बैठे रहे वो लोग
उसके ज़िंदगी के पहलू को, समझा कुछ भी नहीं

इतने आसेब पाल रखें हैं, ज़हन में अपने 
कि ज़ुल्म-ए-अज़ीज़ से, गिला शिकवा कुछ भी नहीं

पुर्सिश-ए-ग़म को भी 'निसार', उनसे आना न हुआ
वो जो कहते थे, "तेरे बिना ये जहाँ कुछ भी नहीं"