तू इनायत ख़ुदा की शाम के बाद सहर है
ज़मीं पर बरतता एक खूबसूरत क़हर है
तू इश्क़-ए-याज़दानी दोसती की मेहर है
लहू को चीर दे वो क़ातिलाना नज़र है
तू अमृत अली की हर का ज़हर है
बहा ले ग़मों को वो मौसिक़ी की लहर है
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