दूर से आई कहीं से परियों के तू गाँव से
बर्फ सा चमकता चेहरा बदन कुंदन की छाँव से
मोतियों सी आँखें लब तेरे शहद से हैं
देखूँ तुझे मुसलसल मैं इश्क़ के किसी घाव से
गेसुओं की सरसराहट ने राज़ कितने है समेटे
छूने की चाहत मुझे है खेलना चाहता हूँ तुझसे
ललक जिस्म की तेरे आँख और मेरी रूह में है
देख तराशे बदन को तेरे खो न बैठु काबू मैं खुदपे
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