आज़ाद ख़ुदको हदों बंदिशों से कर रहा हूँ मैं बसी जो मन में टीस कबकी आज कह रहा हूँ मैं मत करो अत्फ़ चाँद की ख़ैरात सूरज की मुझपर धूप खुदकी अब खुदका ही साया बन रहा हूँ मैं
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