मैंने दानिस्ता, तेरे दिल को दुखाया नहीं
वो ग़ुज़रिशें थीं मेरी, तंज़-ओ-किनाया नहीं
वाकिफ़ रही तेरे, दिल के जानिब वसवसों से
कहीं कुछ टूट न जाए, इसलिए बताया नहीं
माना कि नहीं मुझको, मोहब्बतों का पास
सो, जो पास न था मेरे, वो लौटाया नहीं
गवाह हूँ, गुनाहगार भी, तेरी अज़ाबों का मैं
न गुज़रा जो मुझसे, वो तुझतक आया नहीं
'निसार' बोझल रहा दिल, बाद तर्क़ के
दिल में रह गया तू, तुझे दिल से हटाया नहीं
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