धूप से सुर्ख़ रुख़सार, उसे सूरज कभी सताए नहीं
ये सुख़न मेरी सोज़ा है, उसकी बर्फ़ सी सदाएँ नहीं
मेरी नेकी का सबब वो, मेरी हालत का हर्फ़ उसपे
मेरे लहू का हर क़तरा, उसकी यादों से बाज़ आए नहीं
उसके बियाबाँ के साए को, छोड़ तो आए लेकिन
ये ख़लिश-ओ-तंज़-ए-ज़माना, मुझे रास आए नहीं
माना की पास-ए-वफ़ा, उसकी अदा न थी लेकिन
किसीकी रोज़-ए-ग़ुरबत, कभी कोई यूँ आज़माए नहीं
जिनकी अहद-ए-वफ़ा का, तुझको गुमाँ था 'निसार'
अब मर तो गया, क्या हुआ वो आज आए नहीं ?
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