Thursday, 23 April 2020

अश्क़-ए-नवाज़

मेरा यार भी कितना, अश्क़-ए-नवाज़ है
ये ख़ुश्क तिनके टूटने की, आवाज़ है

चिलमानों के साए में, वो सँवरना उसका !
क्या इल्म था की ये, ग़ज़ल-ए-आगाज़ है

ये किसकी एड़ी में, मोछ आई देखो लोगों
ज़ीना-ए-उम्मीद से, उतरता ये कौन नासाज़ है !

उस पत्थर दिल से, गुहार न लगाऊँ इस दफ़ा
मेरे दर्द-ए-दिल से बड़ा, उसका एजाज़ है

नाम लेकर सहर हो, हर शब भीगें तकिए
इस बदनसीब को तो देखो, कितना मजाज़ है

उसके पाँव के नीचे, आ गया एक ग़ुलाब
वो हँसकर कहती है उसका यही अंदाज़ है

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