दलदल में खड़े शख़्स, की ओर हाथ न बढ़ा
वो अपना मुख़ालिफ़ है, उसे अपना न बना
गर धँसता है, तो धँस जाए, मर ही जाए वो
शिकस्ता-दिल से दिल की, क़रीबियाँ न बढ़ा
फ़िरता है शहर भर में, कालिख़ पोत कर
दीवानों को ख़ज़ानों का, पासबाँ न बना
बाशिंदा अंधेरों का, है माज़ी का मारा वो
तन्हा राहों के मुसाफ़िर से, राबता न बढ़ा
किस किस के वास्ते, क्या क्या 'निसार' है
लेकर हिसाब-ए-सितम, उसे अदना न बना
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