Thursday, 23 July 2020

ज़रयाब

अबतक ज़ीस्त का, ना-तवाँ हिसाब है ।
कैसे कहूँ बिन तेरे, कितना अज़ाब है !

दिल की ज़मीं ये जो, सोज़नुमा है
वजह क्या आफ़ताब है, या तेरा शबाब है

ज़ाया हुआ तेरे, नफ़्स-परस्त बनावट में
तेरी आँखें तेरे गेसू, सहरा-ओ-सराब हैं

वक़्त-ओ-सूरज का है, आज़माया हुआ
तेरा मुझसे मेरा तुझसे, रिश्ता ज़रयाब है

सच कहे कैसे, बिना झूठा बने 'निसार'
तेरे जलवों से भरी, मेरी क़िताब है

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