कर सके, बयाँ मेरा ग़म, वो कलाम न मिला
मेरी आग़ाज़-ए-मोहब्बत को, अंजाम न मिला
तेरे, आशिक़-ओ-शायरों की भीड़ में,
मुझे मुझसा, ऐ सितमगर, कोई बदनाम न मिला
बेचकर के हक़ीक़त, हैं ख़रीदे ख़्वाब तेरे
पर मेरी रूह को, मुनासिब दाम न मिला
तेरी इश्क़ भरी, आँखों का समंदर, क्या कीजे !
इस ख़ाली पैमाने को, वो जाम न मिला
भले तुम भूल जाओ, पर तारीख़ याद रक्खेगी
कि इस जनाज़े को, महबूब का सलाम न मिला
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