खड़ा होकर जज़ीरे पर, तड़पता देखता रहा
सफ़ीना, तूफाँ-ए-समंदर में जूझता, टूटता रहा
हर चाराह-गर ने, हर बार, दावा किया लेकिन
ये ज़ख्म मेरे दिल का, मगर रिसता रहा
तमाशबीन बने रहे, रफ़ीक़-ओ-फ़रिश्ते मेरे
मेरा इश्क़ बेआबरू हुआ, लुटता रहा
कलम टूट गयी, बिखरती रही स्याही
बह गए अश्क़ सारे, लहू लिखता रहा
सोगवार रही ज़ीस्त, जिसके इक़रार पे 'निसार'
उसका एहद-ए-वफा, कौड़ियो में बिकता रहा
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