एक ओर इश्क़, दूजे ओर अश्क़ तौलोगी क्या ?
मैं लिखूँ ग़ज़लें, तुम कुछ नहीं बोलोगी क्या ?
सारा दिन चकोर, चाँद के इंतेज़ार में रोइ
बीती रात मेरी ख़ातिर, किवाड़ खोलोगी क्या ?
मुझे इक़रार-ए-ग़म की, इजाज़त नहीं नसीब
मेरे हिस्से के आँसू भी, तुम रो लोगी क्या ?
ख़्वाब नींद की इजाज़त, नहीं देते मालकिन
बावजूद मेरी मौजूदगी के, सो लोगी क्या ?
मैं वाकिफ़ हूँ तुम्हारे, श्रृंगार के लगाव से लेकिन
मेरे शिकस्ता जनाज़े पर, चूड़ियाँ तोड़ोगी क्या ?
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