सारे फ़सानें रेत में, हुए रफ़्ता रफ़्ता बेनिशाँ
हुआ करता है ये गुनाह, मुझसे आदतन बार-हा
इस दिलगीर मुसाफ़त में, आशनाई ही नहीं
फ़िर कैसी ईसकी मंज़िल, फ़िर कैसा कारवाँ
कलमा थीं उसकी बातें, उसकी आँखें थीं वज़ू
चाँद था उसका चहरा,थीं उसकी यादें ईदगाह
सदफ़ थी उसकी शख़्सियत, रही नीयत गौहार
बेसबब खुलना बना, सबब-ए-मर्ग-ए-ना-गहा
सुना है बड़ा रब्त है, उसे दीवानों से 'निसार'
चलो मक़तल को चलें, उसकी अना पे आज हाँ
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