Thursday, 19 November 2020

रुख़सार

दीवार-ए-दौर पर लिखी, ये जो लंबी लंबी कहानी है
कुछ जुनूँ, कुछ मर्ज़, कुछ कच्ची उम्रों की नादानी है

दुल्हन सी सजा दो, मोहब्बत की चिताओं को
सोज़-ए-शब-ए-हिज्राँ का, कहाँ दूसरा कोई सानी है !

आँखों से छलक कर, जो न रुख़सार पर तड़पे
अगर मुझसे पूछो जाना, तो वो अश्क़ नहीं वो पानी है

तेरी बाँहों की बिना रख़कर, तुझे जी भर निहारा है
बाद तसव्वुर-ए-नंदन, अब भला नींद कहाँ आनी है

'निसार' बैठा है, महफ़िल-ए-हुस्न में जुदा सबसे 
शराफ़त का नहीं शैदाई, बस किसी की बात मानी है

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