है हुनर-ए-ख़ुश-फ़हम में, कितना वो माहिर
क्या मेरे आलम-ए-ग़ुरबत से, नहीं ये ज़ाहिर !
अपने आसमाँ का, सितारा कहा था उसने
सो अब हर दफ़ा टूटते हैं, हर मुराद की ख़ातिर
परवाज़ नहीं, हुई बिछड़न, दो परिंदो को नसीब
मोहब्बत के नशेमन का, ये अंजाम हुआ आख़िर
हूँ झूठा, मुनाफ़िक़ और, तोहमतों से भरी है ज़ीस्त
लेकिन हम भी तो देखें, यहाँ कौन कितना है ताहिर
'निसार' तैराक बहोत हैं, इश्क़-ए-गौहार के सदके
हौसला डूबने का हो, यहाँ ये ज़ज़्बात हैं नादिर
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