इस महफ़िल में, तेरी तस्वीर का कोई सज़ावार नहीं
तेरी बयाँ-ए-कलियत के क़ाबिल, मेरे अशआर नहीं
भले घर न कर सकें दिल में, कलाम पीर के
तेरे घर के बाहर, उस ग़रीब की मज़ार सही
तेरी हथेली में ख़ुदको, मैं सौंप आया हूँ
मेरे मालिक, अब मेरा ख़ुदपे अख़्तियार नहीं
तुझसे बढ़े मरासिम, तो बढ़े ताल्लुक ज़माने से
ये दिल इसीलिए, अब पहले सा सोगवार नहीं
अब और कितनों से बैर ले, तेरी ख़ातिर 'निसार'
अपनी इबादत में बस बर्बाद हुआ है, बेकार नहीं
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