फ़िराक़-ए-यार सदीक, कुछ यूँ बसर की
अफ़सुर्दगी में गुज़ारे दिन, रो रो के सहर की
मुझे तस्लीम तेरा, दीवाना कहना मुझको
अब तो सारा वजूद ही, तेरे शौक़-ए-नज़र की
हुआ ज़माना नहीं वाकिफ़, कि दोस्तों उसने
तर्क़-ए-ताल्लुक़ की, किस किसको ख़बर की
ग़ज़ल में तज़करा उसका, करके मैंने
हर शेर में हर बार, अपनी ज़ात मुख़्तसर की
तुझसा खिलौना तोड़ कर, रोया हो कुछ पल
ऐ 'निसार' बता तेरे होने पे, किसने ये महर की !
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